App depo bhava :अप्प दीपो भव

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अप्प दीपो भवः

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महात्मा बुद्ध ने कहा था अप्प दीपो भव अर्थात अपना दीपक स्वयं बनो। अंधेरे के कोलाहल के बियावन में दीप (प्रकाश) से बड़ा मार्गदर्शक कौन हो सकता है भला। समय के भीषम त्रासदी में जब हमारा पुरा-पुरा समाज एक बेहद तनावपूर्ण, कठोर और संस्लिस्ट संबंधो के चक्रवात मे जीता है या जबरन जिये जा रहा है। वैसी ही स्थिति में विश्लेषणात्मक विवेक से लिया गया ज्ञान  जब रचनात्मक ऊर्जा के बदौलत वर्तमान को टोहता है तब देखता है कि समय से बड़ा रचनाकार कौन हो सकता है? वही समय जो कई-कई लम्हों, सदियों में बंटे इतिहास के पन्नो में उतरकर अतीत, वर्तमान और भविष्य का गवाह बनता है और जीवन की जीवंत चेतना बन जाता है। 


निरुदेश्य लिखना, लिखते चले जाने की भूख, प्रकाशित होने की खुमारी ये किसी रचनाकार का माप दंड नहीं हो सकता। एक रचनाकार का असली परिचय है - अपने सभी पूर्वाग्रहों, वैचारिक संक्रीनताओं, भौतिक सुखों और मानसिक द्वन्दो से मुक्त होकर, मानवता, समाजिक स्वीकार्यता की सतत्त प्रकाशित करना

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मनुष्य कोई साधारण  नहीं, बल्कि आसाधारण। वह किसी भी पल चमत्कार कर सकता है। असम्भव को संभव, अपने श्रम से दुर्लभ, विश्व का मानचित्र बना सकता है। मनुष्य से बड़ा न कोई ईश्वर है न कोई संस्थान। व्यक्ति का स्वार्थ, उसका अहम, अहम के आत्ममुग्धता में बैठे उसकी घृणा, तिरस्कार, भय और आतंक की रचना करता है। समाज के निचले पायदान पर, और पंक्ति के हासिए पर खड़े  मनुष्य की अस्मिता, उसके कठोर संघर्ष, उसके अपने जीवन के प्रति जिजीविषा, स्वप्नकुलता की गरिमा की  रक्षा करने की जम्मेवारी कलम पर है। और इस स्थिति में कलम का काम इन्साफ की एक इकाई के रूप में अपनी मनुष्यता का निरंतर जाँच करना है। साथ ही जन साधारण परिवेश में अपने सबसे न्यायिक अनुभवों, जिम्मेवारियों, स्मृतियों, आकांक्षाओं, और नैतिक मूल्यों  मे परम्परा और लोक की अक्षुन्न मर्यादा की जातीय चेतना को गूंथना। और तब स्वयं का विश्लेषण और आत्म परीक्षण के प्रकाश से प्रकाशित यह मार्ग सांस्कृतिक विरासत के जिस वृहतर समतल पर खुलता है, वहाँ सबकुछ सर्वव्यापी और देश कालातीत हो जाता है।


किसी समय विशेष को पंक्तिवध करने से पहले ज्यादा जरूरी है उस समय की पहचान करना और समय के साथ अपने अंतर्संबंधो की वास्तविक पड़ताल करना कि क्या वहाँ वास्तव में  नफ़रत और उन्माद की उफनती  हुई प्रतिशोध की आँधिया है, या व्यक्ति के स्वयं के आत्मसंतुष्टि के लिए, या स्वमनोरंजन के लिए या अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए इधर उधर पैर पटककर समृद्धि पाने का मौकापरस्ती, या फिर प्रतिशोध के केसरिया बाने को अपनी त्वचा का रंग बनाने की बेचैनी। लेकिन समय को रचना इतना सरल काम है क्या? 


रचना किसी नाटकीय तरह से तथ्यों, व्यक्ति विशेष या प्रदेश की सूचनाओं, घटनाओं, से बुने जायकेदार किरदारों के जरिए बहुत छोटा सा वर्तमान को दर्ज करने की कलात्मक प्रक्रिया नहीं है। वह समय के अनगढ़ और बिखरी हुई सूक्ष्म से सूक्ष्म बारीकियों के भीतर गहरी डुबकी लगाकर ध्यानमग्न साधना भी है और वक्त के चुनौतियों से ईमानदारी के साथ सामना करते हुए  अपने भीतर के दरारों, सवालों और  व्याकूलताओं को एक नए स्वप्न और उम्मीद का रूप देने की न्यायिक तलाश भी है।

एकदम ताज़ा और तत्काल से साक्षात्कार कर तत्काल की निःसंग पड़ताल मे समयातीत हो जाना यही रचना है। 

(क्रमशः)

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