बेला-हिंदी
पिछले रविवार को सप्ताहिकी में एक आलेख लिखा था 'अप्प दीपो भवः, उसी को बढ़ाते हुए उसी की दूसरी कड़ी
बुद्ध ने कहा -"अप्प दीपो भवः" तुमने सुना, और पढ़ा भी। लेकिन गुना किसने? तुम अंधकार के मुसाफ़िर अन्धकार मे ही भटकते रह गये। चिल्लाते रहे त्राहि माम त्राहि माम। बालक सिद्धार्थ सत्य की खोज में चला वर्षो वन, नगर घूमता रहा सत्य नहीं मिला। जब स्वयं के अंधकार को त्याग कर प्रकाश बना अपना उजाला रचा तो वे बुद्ध हुए। अपना प्रकाश बने। लेकिन तुम...
महात्मा बुद्ध ने करुणा को गले लगाया, प्रेम को शीश नवाया, शांति को अपनाया, और सह अस्तित्व के साथ अपने अंधेरे से लड़ते हुए अपने मनुष्यता को जीवन का महामंत्र दिया। और निर्मल पानी की तरह समय के प्यास को बुझाया तो सुमधुर हवा की झोंको की तरह समय का सबसे बड़ा वरदान बन गया।
डा अम्बेडकर का पुरा बचपन उपेक्षा तिरस्कार में बिता। लेकिन उन्होंने कभी भी स्वयं को उपेक्षित महसूस नहीं होने दिये। एक दिन वही उपेक्षित और समाज से तिरस्कृत लड़का भारत को अनेक ग्रंथों सहित देश को दुनिया का सबसे बड़ा संविधान दिया। अपने विवेक, न्याय, और आदर्श के हथियार से अंध विश्वास के घोर कुहरे से लड़ते हुए अपने इंसानियत को सबसे ऊंचा लहराया।
आज वर्तमान सामाजिक और वैचारिक दृश्य को देखता हूँ तो पाता हूँ कि, कैसे लोग अपने अपने उत्सव के उन्माद में, ग्लैमर, रोमांस, प्रचार और मुखौटे से बने हमारे समय से बहुत-सी अमूल्य संभावनाओं को पुरी तरह ख़ारिज करते हुए एक नया सिंबल चिपका दिया है; और हम इस खूबसूरत होशियारी से भूसा सने अनाज को डिब्बा बंद ब्रांड बनाकर एक स्लोगन देकर हमारी थाली में परोस दिया है कि ठगे जाने की चेतना के बावजूद हम बाग-बाग हैं। खुशियाँ मनाने में व्यस्त हैं। हमारे विरासत के महान ज्ञान को सूचना ने, हमारे तर्क को आवेश ने, हमारे सत्य को लच्छेदार वक्ता कला ने, संवेदना को भावुकता ने, धर्म को पाखंड ने, विज्ञान को अंधविश्वास ने पूरी तरह लील लिया है। बौद्धिक प्रखरता और नैतिक हौसले की आवाज से गूंजती आलोचना को गाली कहकर ज़मींदोज़ कर दिया गया है। या उससे हम इतने भयभीत हो गये है हमारी चेतना ही बेजान होकर बिलख रही है।
आलोचना रचनाकार की कलम है- उसकी मेधा, उसकी आँख, उसके पंख. आलोचना ही तो बताती है कि अतीत परिमित है और भविष्य अपरिमत; आलोचना ही तो बतलाती अतीत हमारा कितना भव्य है और भविष्य कितना प्रकाशित; हमारा वर्तमान अतीत की अन्यायपूर्ण नीतियों का ‘न्यायालय’ नहीं हो सकता; यदि अतीत में गुजरना है तो याद रखना होगा वक्त के साथ बड़े-बड़े दुर्गम किले भी खंडहर हो जाते हैं, लेकिन मौत जिसे छू भी नहीं सका। वे आज भी हैं इंसानी ऊष्मा से महकती और खिलखिलाती बस्तियां।
वर्तमान में तमाम सत्ता- प्रतिष्ठानों और मानवाधिकारों की संरक्षक संस्थाएं जब स्व के स्वार्थ में एक-जुट होकर शोर मचाता है तब सामाजिक न्याय-विवेक को अलविदा कहकर ‘ईश्वर-ईश्वर’ खेलने में रम जाएं, तब छुपा दिए गए और हासिए पर लहूलुहान सत्य को उघाड़ने के लिए आलोचना की पैनी नजर ही सिरे से तहकीकात करती है।
आलोचना समय की सजग बौद्धिक प्रहरी है और किताबें उसकी ऊर्जा का खुराक, शायद इसलिए शिक्षा-संस्थानों की गुणवत्ता का अवमूल्यन करने के साथ-साथ पुस्तक-संस्कृति और हमारे चिंतन-मनन की प्रवृत्ति को भी कमज़ोर और भयभीत किया जाने लगा है। और तब रचनाकार का पहला दायित्व यही बनता है कि वह संवेदना में पल्लवित बौद्धिकता और सम्पूर्ण संस्कृतियों की तमाम बौद्धिक संपदा को बचाने के लिए कमर कस ले. नालंदा विश्वविद्यालय के पुस्तकालय का जलाया जाना, प्रेमचंद के उपन्यास रंगभूमि की प्रतियाँ जलाया जाना, डॉक्टर अम्बेडकर के पुस्तकों को सदियों तक प्रकाशित न होने देना महज एक ऐतिहासिक घटना नहीं, एक बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण रूपक है जो आज भी ज्ञान-परंपरा को मटियामेट करने में लगा हुआ है. रचना तभी ‘रचना’ है जब वह अपने समय में कोई सार्थक हस्तक्षेप कर पाए. सदियों से मार्ग में व्याप्त अंधेरे का सीना चीर कर रौशनी का प्रसार करे; समाज में भय और पीड़ा में जी रहे आमजन में उष्मा का मलहम लगाकर शक्ति और अधिकार का संचार करे।
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आज का समय औसत और अनैतिक मूल्यों को महिमामंडन का समय है। कुछ अच्छा पाने की चाह में बहुत अच्छा और समृद्धि को खोते जा रहे हैं। हमने हर संभावित खतरे से निपटने के बजाए उससे ही पीछे हट रहे हैं। हम अपने अधिकारों से समझौता कर बेवस होते जा रहे हैं। मोती पाने की चाह में हमने गहराई में डूबना बंद कर दिया है. मोती चुगकर नीर-क्षीर-विवेक पाना तो ज़ाहिर है तब तो सम्भव भी असम्भव हो जाएगा. किसी भी तरह चलते चले जाने को हमने आगे बढ़ने का पर्याय बना लिया है.
ऐसे विलोम समय में रचनाकार के रूप में लेखक की विचार-यात्रा शुरू होती है. हमें अपनी समुची सीमा के साथ विपरीत परिस्थितियों में भी प्रतिरोध की मशाल को जलाए रखना होगा. मुझे याद आता है क्यों प्लेटो कवि को अपने गणतंत्र से निष्कासित करना चाहते थे. क्यों सुकरात को विष का प्याला थमाता गया था। मै हमेशा से प्रयास करता हूँ कि अपनी भावनाओं में उत्तेजक नहीं बनना है, बल्कि भावनाओं का परिष्करण और उन्नयन ही मेरी विचार-यात्रा का निर्भय मार्ग होगा। अतीत की यादों में स्मृतियों का उत्खनन नहीं, भावुकता में लिथड़ी असहाय स्मृतियों का निर्लज्ज उपभोग है.
मैं लिखता हूँ कि उपभोक्ता संस्कृति के दबावों के विपरीत तैरकर उन तमाम साजिशों का पर्दाफाश कर सकूं जो मनुष्य को बौना, अपंग, असहाय और विवस बना रही है।
मै इसीलिए लिखता हूँ कि वक्त को बता सकूं, साहित्य लेखक के सुर में सुर मिलाकर कृति को पढ़ना नहीं है. साहित्य एक चेतना है जो पाठक से सह-सर्जक और रचनात्मक होने की अपील करता है। अपेक्षा यह कि पाठक स्वयं को अपने समय और रचना के समय के खूंटे से मुक्त कर ले ताकि अपनी तमाम बौद्धिक-वैचारिक-मानसिक संपदा के साथ ‘निर्भर’ होकर अखंड-अनंत समय की विराट-यात्रा पर निकल सके.
लिखती हूं कि सरपट दौड़ते घोड़े सरीखे वक्त की रास थाम सकूं. कुत्सित लिप्साओं के राजसूय यज्ञ को यूं ही निर्विघ्न संपन्न नहीं होने दिया जा सकता है । यह हमारे समय का सत्य है।

