एक जरूरी और सार्थक आवाज की गूँज
- सृजन के सच्चे और वास्तविक, संवेदनात्मक जीवन के बनते बिगड़ते अनुभव के कशमकश से गुजरते हुए, शब्दों को तराशने का हुनर, किसी स्थापित कथ्य की दुरुहता का शिकार हुए बिना सरल भावों को ईमानदार तरीके से शब्दों में पिरोने और प्रथम दृश्या आकर्षित कर लेने वाली कविता का सृजन करने वाले कवि हैं डा. विमलेश त्रिपाठी। उनकी छवि संवेदनशील भावों को सहज ही प्रस्तुत कर देने वाले कवि की है। डा. विमलेश त्रिपाठी का कविता संग्रह समकाल की आवाज सीरीज से चयनित कविताएं शीर्षक से न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन्स, न्यू दिल्ली से आया है। उस पुस्तक की समीक्षा लिखे है सुरेंद्र प्रजापति ने । आइए बेला हिंदी पर पढ़ते है विमलेश त्रिपाठी के कविता संग्रह 'समकाल की आवाज: चयनित कविताएं' पर लिखी समीक्षा। आप भी पढ़ें और अपनी राय से अवगत कराएं।
एक जरूरी और सार्थक आवाज की गूँज!
जीवन जगत और प्रकृति के भिन्न-भिन्न अनुभवों से परिचय कराने वाली विधा कविता है। कविता अपने समय और व्यक्ति समाज के साथ कवि के व्यक्तिगत जीवन में गहरे बैठ कर साक्षात्कार ही नहीं बल्कि उसके तमाम बंदिशों को काटकर जरूरी संवाद करती है। कविता के लिए आवश्यक और उपयुक्त उपकरण जिसमें शब्द और विम्ब निथर कर पुरी तरह स्वच्छ हो जाती है, जिसमें एक सरल, सहज, और संवेदनशील कवि की अनुभूतियाँ छिटककर अपने स्पर्श से चमत्कृत कर देती है, कवि के रचना-क्रम का ही एक हिस्सा होता है। एक परिपक्व और सयाने उम्र में पहुँचने के बाद जहाँ हम अपनी घरेलू व सामाजिक उतरदायित्वों को समझने लगते हैं, जहाँ पहुँच कर हमारी जिम्मेवारियाँ किसी को आनंदित करने लगती है, वहाँ एक कवि, भावों की यथार्थ गंभीरता को पोत लेता है, और उसकी तीव्रता से चौकन्ना रहता है। शब्दों की सौम्यता और विशालता को सींचता है। और अपनी कहन की शैली और कहे हुए को खूब लहराते हुए देखने का दम-खम रखता है। यही विशिष्टताएं और चुनौतियाँ ही किसी रचनाकार के रचनात्मक सफर को सघनता प्रदान करती है।
सृजन के सच्चे और वास्तविक, संवेदनात्मक जीवन के बनते बिगड़ते अनुभव के कशमकश से गुजरते हुए, शब्दों को तराशने का हुनर, किसी स्थापित कथ्य की दुरुहता का शिकार हुए बिना सरल भावों को ईमानदार तरीके से शब्दों में पिरोने और प्रथम दृश्या आकर्षित कर लेने वाली कविता का सृजन करने वाले कवि हैं डा. विमलेश त्रिपाठी। उनकी छवि संवेदनशील भावों को सहज ही प्रस्तुत कर देने वाले कवि की है।
सोशल मीडिया पर डा. विमलेश त्रिपाठी की कविताओं से गुजरना सुदूर ग्रामीण अंचलों से गुजरना है। जहाँ अपने समय और समाज को ईमानदारी के साथ-साथ प्रतिविंबित करते हुए उसे और आगे की ओर ले जाती है। और जहाँ हाशिए पर परिस्कृत जीवन मूल्यों को गहराई से व्यक्त करती है, जिन्हे मुख्य धारा से आज भी वंचित रखा गया है। उसके बेतरतीव आवाज को अनसुना कर दिया गया है। डा. विमलेश त्रिपाठी का कविता संग्रह समकाल की आवाज सीरीज से चयनित कविताएं शीर्षक से न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन्स, न्यू दिल्ली से आया है। संग्रह पुस्तक का एक-एक पन्ना मेरे सामने जीवन के सुख-दुःख, उदासी, चित्कार, हताशा, पीड़ा, उदासी के बेवस शोर की शक्ल में खुलता जा रहा है, और मै उसमें डूबता जा रहा हूँ। इस संग्रह की प्रत्येक कविताएँ सत्ता प्रतिष्ठानों, शहर के अभिजात्य घरानों से दूर, गाँव देहात, जनपदों, कस्बों में बसे लोक को पैनी नजरों से देख रही है। कवि की दृष्टि से देखते हुए, मानवीय संवेदना से संवाद करती है। पहली ही कविता की कुछ कुछ पंक्तियों को देखिए:-
"मंदिर की घंटियों की आवाज के साथ
रात के चौथे पहर
जैसे पछियों की नींद को चेतना आती है।"
कवि गाँव की स्मृतियों में दूर तक सफर करता है। आज की नई तकनीक, बाजारवाद, और दूरसंचार ने मानवीय संवेदना को लगभग विलुप्त कर दिया है। आज का आदमी रोबोट की तरह चलता फिरता मशीन में बदल गया है। कवि इसी विकृत और रंगहीन तस्वीर को देखकर विचलित है। अपने लोक, अपने गाँव में लौटने के लिए व्याकुल है। जहाँ माँ है, पिता हैं, भाई है, बहन है, अपने परिवार की आत्मीयता है, अपने समाज की मर्यादा है, अपनी एक पवित्र सामाजिक परम्परा है। कवि की संवेदना महानगर की चकाचौंध के गिरफ्त में नहीं है। संग्रह की दूसरी कविता है:- 'कविता से लम्बी उदासी' क्या गजब का ट्रीट दिया गया है कविता में। एकदम से हृदय को झकझोर देनेवाली। एक-एक पंक्ति जैसे आम लोगों की अपनी ही उदासी हो और वो भी लम्बी, विस्तृत। और यह उदासी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। प्रश्नांकित करती है। कुछ संदर्भ देखा जा सकता है:-
"कविताओं से बहुत लम्बी है उदासी
यह समय की सबसे बड़ी उदासी है
जो मेरे चेहरे पर कहीं से उड़ती हुई आ गई है
मै समय का सबसे कम जादुई कवि हूँ
मेरे पास शब्दों की जगह
एक किसान पिता की भूखी आंत है
बहन की सुनी मांग है
छोटे भाई की कम्पनी से छुट गई नौकरी है
राख की ढेर से कुछ गर्मी उधेड़ती
माँ की सुजी हुई आँखे है।"
इन पंक्तियों में कवि की पीड़ा, परिवार की दारुन कथा इतनी मुखर है कि जैसे लगता है यह घर-घर की पीड़ा हो। जैसे विस्थापन का जब-तब रिस्ते रहने वाला दर्द हो। यह सिर्फ कवि की उदासी नहीं है, बल्कि आम लोगों की उदासी है। जाति, धर्म, वर्ग, लिंग, क्षेत्र जैसे विभाजन रेखा में प्रवेश कर इस जटिल समय में अपनी पूर्ण कलामकता के साथ, जीवंत सच्चाइयों को और बहुत ही बारीकी के साथ उकेरना एक विरले कवि का ही काम है।
डा. विमलेश त्रिपाठी पुस्तक के आत्म वक्तव्य में लिखते हैं:- "कविता की संरचना की सबसे बड़ी चुनौती वर्तमान जटिल सामयिक परिपेक्ष्य में स्वयं को उतनी ही ताकत के साथ खड़ा करना है।" और इसी सच्चाई को उद्घाटित करते हुए, उसी वर्तमान की चुनौतियों से वे मुठभेड़ करते नजर आते हैं। इन पंक्तियों को देखिए:-
"वहाँ कितनी उदासी होगी /
जहाँ लोग शिशुओं को चित्र बनाकर
समझाते होंगे आसमान की परिभाषा
तारों को मान लिया गया होगा एक विलुप्त प्रजाति।"
इन पंक्तियों में कवि कोमल वात्सल्य की अनुभूतियों को समय की कसौटी पर रांधते हुए कितने मार्मिक हो जाते हैं। इतना सबकुछ करने के बावजूद भी कवि किसी व्यक्ति विशेष के लिए अहसानमंद नहीं बनना चाहते। इसीलिए तो वे लिखते हैं:-
"मै हूँ समय का सबसे कम जादुई कवि
क्या आप मुझे क्षमा कर सकेंगे।"
आज के डिजिटल समय में जबकि साइनिंग इंडिया के सपने दिखाए जा रहे हैं, पढ़े-लिखे बेरोजगार युवा की कतार और लम्बी होती जा रही है। आम जन हैरान परेशान हैं। समय के चक्र में उदासी, पीड़ा, करुणा कराह रही है। कवि चिंतित है। 'बेरोजगार भाई के लिए' कविता की चंद पंक्तियों को देखिए :-
"उदास मत हो मेरे भाई
तुम्हारी उदासी मेरी कविता की हार है।"
पुनः उसी उदासी के बादल को बेधते शायद बेरोजगार युवाओं को ढाँधस बँधाते हैं :-
"उदास मत हो मेरे भाई
मेरे फ़टे झोले में बचे हैं आज भी कुछ शब्द
जो इस निर्मम समय में
तुम्हारे हाथ थामने को तैयार है।"
कवि इन पंक्तियों में अपने समय के भयानक सच को उद्घाटित करता है। कवि उस समय के नाजुक तारों को छूकर उसकी करुणाशिक्त मनः स्थितियों को उकेरने की कोशिश करते हैं। देर तक हमारे दिमाग में कौँधने वाली इनकी कविताओं में जीने की तड़प है, एक उम्मीद है।
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| विमलेश त्रिपाठी |
बिहार में हुए एक नरसंहार में जहाँ जीवन और मौत के बीच खुनी खेल चलता रहा। गलियाँ, चाक-चौराहे पुरी तरह सुनसान पड़ी थी। घर के एक-एक दरवाजे में भय और आतंक का दहसत था। किसी का कोख उजड़ गया था, किसी की मांग सुनी हो गई थी, किसी मासूम के पिता की लाश को पेड़ पर लटका दिया गया था। वह दबे पाँव अब भी ताण्डव नृत्य कर रहा है। लेकिन अंततः जीवन तो है, जीने की गंध, जीने की ललक। जीवन के उत्स तो मृत्यु के नाभि में भी बसते हैं। जिसे कवि ने 'जीने का उत्सव' कविता शीर्षक में बहुत ही जीवटता और साहस के साथ प्रस्तुत किया है। जैसे सबकुछ मिट जाने के बाद एक जीवन तो सो रहा है मृत्यु की गोद में। एक आतंक खिलखिला रहा हैं गलियों में। इन पंक्तियों को देखिए:-
"एक समय मर रहा है
और अपने जीने को सीने से चिपकाए
लोग सोने की तैयारी कर रहे हैं।"
ये पंक्तियों खुनी संघर्षों के बुरे दिनों की याद दिलाती है। साथ ही जीवन यात्रा को हर संभव जारी रखने का संदेश भी देती है। मलवाती, सगुण, चूमावन, धरन जैसे शब्दों से कवि को कितना लगाव है। कवि की उम्मीद, आमजन की उम्मीद है। आम लोगों के जीने की ललक है। 'हम बचे रहेंगे' कविता की इन पंक्तियों को देखिए :-
"सबकुछ के रीतजाने के बाद भी
माँ की आँखों में इंतजार का दर्शन बचा रहेगा।"
डा. विमलेश त्रिपाठी अपनी कविताओं पर केदारनाथ सिंह का असर स्वीकार करते हैं। इनकी कविताओं में भावात्मक प्रवाह की मार्मिकता है। 'अकेला आदमी' शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियों को देखें:-
"उनके अकेलेपन में कई अकेली दुनियाएँ साँस लेती है
उन अकेली दुनियाओं के सहारे
वह उस तरह अकेला नहीं होता है
अकेले आदमी के साथ चलती हुई
कई अकेली स्मृतियाँ होती है।"
यह कवि के घोर आशावादी नजरिए का चमत्कार है। विंब सहज-सरल शब्दावली में सारा दृश्य प्रस्तुत कर देता है। उनकी कविताओ का फलक विस्तृत है। वे छोटी सी छोटी कविता में बड़ी बात कहने की कुबत रखते हैं। इन पंक्तियों को देखिए:-
"वह पिघलता है
और ढलता है चाक़ू मे
तलवार में बंदूक में सुई में
और छेनी हथौड़ी में भी।" (लोहा और आदमी)
'कवि हूँ' कविता में बहुत कुछ सत्ता प्रतिष्ठानों के बाज़ीगरी की ओर संकेत करता है। और इस खतरनाक समय में कवि स्वयं पर गर्व करने की बात करते हैं :-
"एक ऐसे समय में शब्दों को बचाने की लड़ रहा हूँ लड़ाई
यह शर्म की बात है कि मै लिखता हूँ कविताएँ
यह गर्व की बात है कि ऐसे खतरनासक समय में
कवि हूँ...कवि हूँ..."
'महानगर लोकतंत्र और मजदूर' शीर्षक कविता में मजदूर के श्रम और संघर्ष को बहुत ही बारीकी से रचा गया है। साथ ही देहाती अंचल में चल रहे हथौड़े के बनिषपत देवताओं के बहाने मंदिरों में चढ़ावा, बढ़ता हुआ देश का व्यापार, बड़े ही सजीव तरीके से दर्ज हो पाया है। दैनंदिक जीवन में कवि महानगर कोलकाटा में रहते हुए भी वहाँ की सभ्यताओं के गिरफ्त में नहीं है। चाहे वह सड़क हो, फुटपाथ हो, बस का सफर हो प्रत्येक जगह कवि अपने होने और अपनी संवेदना में जीने को उत्सुक दीखते हैं। 'दुःख एक नहीं' कविता में कवि को जो दुःख है वह प्रकृति के दोहन, पर्यांवरणीय विषमता का दुःख है :-
"दुःख यह मेरे बंधु
कि बचपन का रोपा आम मंजराया नहीं
कोयल कोई गीत गाई नहीं
धरती कभी सपने में भी मुस्कुराई नहीं"
धरती का नहीं मुस्कुराना यानी धरती का बंजर होते जाना, धरती का तपना, धीरे-धीरे हरियाली का विदा होना। 'स्वीकार' कविता में कवि एक मिथक ही रचते हैं:-
"समय के लिहाज से
अबतक मूर्खों ने ही बचाया है
कला की दुनिया को"
यह कोई फंतासी नहीं है बल्कि सच है। मूर्ख होना बदशक्ल होना, सभ्य समुदाय के लिए एक दाग़ हो सकता है। लेकिन इस विकसित सभ्यता के नींव में जो ईंट,गारा, पत्थर लगा है वह इन्हीं मूर्ख साधारण लोगों के श्रम और पसीने की नक्काशी है। 'राजघाट पर घूमते हुए' कविता में कवि की करुणाशिक्त आँखों में महात्मा गाँधी की छवि उभरती है और यह अकारण नहीं है, एक बेचैनी है। राष्ट्रपिता के बलिदानों के बदले राष्ट्र के दयनीय दशा के प्रति उनके रघुपति राघव राजा राम, उनके टोपी को धारण कर उनके की पवित्र देश को रौंदा जा रहा है। यह कैसी विडंबना है घोर निराशा में डूबा हुआ। उनके ही अरमानों से होली खेलकर उनके अंतिम राम को प्राण प्रतिष्ठा दिलाने वाले कौन लोग हैं? उनके स्मृतियों से कवि का संवाद करना एक महाकाव्य को याद करना है। इन मार्मिक पंक्तियों को देखिए:-
"बताओ! तुम्ही लाखों करोड़ों के जायज पिता
आँखों में रिस्ते आँसू पोछे किसी लायक पुत्र ने
तुम्हारे चरखे की खादी
और तुम्हारे नाम की टोपी
पहन ली सैकड़ों लाखों ने
× × × × ×
तुम्हारी पृथ्वी के नक्शे को नँगा कर
सजा दिया गया
तुम्हारी नंगी तस्वीरों के साथ
सजा दी गई
तुम्हे डगमग चलाने वाली कायर घड़ी"
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शब्दों के भीतर घृणा, गुस्सा, या कभी-कभी अपनी अक्षमता के फ़्लस्वरूप जो एक तिरस्कृत और नंगा शब्द निकलता है वो है 'गालियाँ।' प्राचीन काल से ही मनुष्य, अपनी धौन्स अपनी तृष्णा हवस को पुरा करने के लिए या कमीनापन का परिचय देने के लिए लड़ाई-झगड़े के समय गाली का इस्तेमाल पवित्र मंत्र की तरह करते आया है। जहाँ तलवारे नहीं चलती, जहाँ संगीने झुक जाती है, जहाँ अपना वर्चस्व पनाह माँगने लगता है, वहाँ काम करती है गालियाँ। डा. विमलेश इसी वीणा पर पुरा वितान रचते हैं:-
"खूब गुस्से में जब कर नहीं पाता कुछ
चला नहीं पाता तलवार
हाथ काँपने लगते हैं पिस्तौल पकड़ने के पहले ही
साथ देती है गालियाँ।"
डा. विमलेश त्रिपाठी की कविताओं में विंब, प्रतिक, घटनाएँ संग-साथ विहार करती नजर आती है, जसमें पुरा का पुरा दृश्य उभरता है। यह एक अद्भुत कविता है। धीरे-धीरे भाषा और संवाद में शालीनता के टूटने और उसके विकृत दंश को जानने वाला कोई साधारण बात नहीं है और इसी भाव भूमि के भीतर एक शशक्त कविता पैदा होती है:-
"कुछ भी न कर पाने की बेवशी के समय में
मै तंग आकर लिख रहा हूँ कविता
जैसे कि बक रहा हूँ गालियाँ
और देखिए मुझे गर्व है सचमुच इस बात पर।"
इंटरव्यूह, गमछा कुछ इसी तरह की दृश्यावली रचती है। 'बहने' शीर्षक कविता में स्त्री विमर्श है। जहाँ बचपन में माता-पिता का स्नेह है। भाई-बहन का दुलार है। फिर भी उसका जीवन स्वतंत्र नहीं है। स्त्रियाँ हमेशा परम्परा के नाम पर छली जाती है। कहीं पहुँच कर भी कहीं नहीं पहुँच पाती। डा. विमलेश त्रिपाठी स्त्री पीड़ा को उनके बिखरते सपने का पुरा वितान ही रचते हैं इस कविता में :-
"उन्हे कुछ नहीं बनना था इस आभागे देश में
उनके कुछ भी बनने पर बहुत पुरानी कब्रों के
भूतों के पहरे थे
कई मिथकों के बड़े और भारी ताले।"
डा. विमलेश त्रिपाठी की कविताओं में पेड़ है, पहाड़ है, जंगल है, पथ हैं और उनपर एक सतत चलता हुआ आवाज है। समाजिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक विसंगतियों पर कवि की नजर है। इनकी कविताओं में भावात्मक प्रवाह की समानांतर गति है।
इस पूरे संग्रह में डा.विमलेश की कविताएँ उदास और हताश मौसम में भी उम्मीद और विश्वास की टहनी पकड़े रखने की हिमायती है। पुस्तक पठनीय और संग्रहनीय है। इस विषद संग्रह के लिए कवि को बहुत-बहुत बधाई।
~सुरेन्द्र प्रजापति
गया, बिहार


