यादों के झरोखे से
जीवन रूपी गाडी का एक पहिया सुख है तो दुसरा पहिया दुःख है। एक खुशी है तो दुसरा गम है, पहला धुप है तो दुसरा छाया है। और यही दो पहिए के दम पर जीवन चलता रहता है । यादों के झरोखे से" मे आज अर्जुन प्रजापत का यह सुरुचिपूर्ण आलेख 'आपदाओं के कितने स्वरूप'
प्राकृतिक आपदा एक ऐसा सत्य है जो कभी न कभी सभी प्राणियों के जीवन में आता ही रहता है। यदि ऐसा न हो तो जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं रह पाएगा। ये आपदा या घटना किसी के जीवन में कब घटित होगा ये किसी को पता ही नहीं होता। यदि ऐसा होता तो कभी किसी भी प्राणी के जीवन में कोई आपदा आता ही नहीं अर्थात हम सब आपदा क्या है जानते ही नहीं?
लेकिन ऐसा होता ही नही क्योकि हम सभी के जीवन मे यदि आपदा न आये तो उस जीवन का कोई अस्तित्व ही नहीं रहेगा और जब जीवन का कोई अस्तित्व ही नही तो वह जीवन बेकार और बेजान होकर रह जायेगा। यदि जीवन है तो उसमें उत्थल् पुथल होना प्रकृत के नियमों का हिस्सा है, और उन्ही मे आपदा का नाम भी शामिल है। कहते हैं न कि कोई भी गाड़ी दो पहिए के बिना नहीं चल सकती है, उन्हीं में जीवन कि गाडी का संचालन कैसे सम्भव हो सकता है। जीवन रूपी गाडी का एक पहिया सुख है तो दुसरा पहिया दुःख है। एक खुशी है तो दुसरा गम है, पहला धुप है तो दुसरा छाया है। और यही दो पहिए के दम पर जीवन चलता रहता
। इसके आभाव में जीवन का कोई महत्व ही नहीं रह जाता।
जीवन में यदि कोई अप्रत्याशित घटना घट जाती है तो उन्हे ही हम प्राकृतिक आपदा का नाम दे देते हैं उन्ही आपदाओं की कड़ी में एक मै अपने जीवन में बीते एक अप्रत्याशित घटना का उल्लेख करने जा रहा हूँ।
बात उन दिनों की है मै किशोरवस्था में था उस समय मेरा उम्र मात्र सत्रह वर्ष का था। और मै 10वीं कक्षा का छात्र था। अपने गाँव से चर किलोमीटर दूर मेरे पड़ने का आशियाना हुआ करता था। फ़रवरी का महीना और बसंत पूरे यौवन पर। खेतोँ में दूर दूर तक रब्बी की फ़सलें लहलहा रही थी। सरसो के पीले फुल धरती को मानो पीले वस्त्रों से ढँक लिया था। बसंती हवा के झोंकों ने तो प्रकृति के वातावर्ण को और भी मोहक बना दिया था। चने में तब फलियाँ भी लगने लगी थी। मटर छिमियो से लदा था। गेहूँ की बालियाँ झूम झूम कर खेतोँ में नृत्य कर रही थी।
अगले महीनें में मेरा 10 वीं बोर्ड का इम्तिहान था। चुंकि इम्तहान था इसीलिए मै काफी व्यस्त भी था। पढ़ाई में व्यस्तता के कारण मेरा खेत खलिहानों में आना जाना न के बराबर था। एक दिन सुवह के करीब दस बज रहे होंगे, मै अपना साइकिल उठाया और खेतों के तरफ निकल पढ़ा। करीब एक किलोमीटर की दूरी पर ही अपना खेत पड़ता था। और वहां तक नहर के किनारों से जाना पड़ता था। आगे चने के खेत थे। कुछ देर तक मै खेतों में घूमता रहा और मनोरम दृश्यों का लुफ्त उठाता रहा। करीब गयारह बजे वहाँ से वापसी के लिए रवाना हुआ। नहर के एक किनारे कच्ची सड़क थी और दूसरे किनारे पैदलनुमा लीक (पगड़ंडी)।
मै अपनी साइकिल पर सवार पगदण्डी के सहारे आगे बढ़ रहा था। मंद-मंद हवा चल रही थी। कुछ कदम आगे आने के बाद उसी पगड़ंडी के किनारे एक कुआँ बना हुआ था, जिसकी गहराई बाईस फीट के करीब था। कुएँ की भीतरी दिवार उपर से करीब पाँच फुट की गहराई तक सीमेंट से प्लास्टार था। पगड़ंडी और कुएँ के बीच में करीब डेढ़ फीट का फासला था। मुझे उसी तंग रास्ते से गुजरना था। मै ज्योंहि उस कुएँ के पास पहुँचा तभी अचानक चक्रवात उठा और मै उस चक्रवात में साइकिल के साथ फँस गया। और अचानक मै उस चक्रवात से निकलने का कोशिश कर रहा था लेकिन नाकाम! मै अगले कुछ पलों के अंतराल में उस कुनै के अंदर जा गिरा। कुआँ बिल्कुल सुखा था। मेरे शरीर की समस्त ऊर्जा जैसे निचोड़ ली गई हो। आँखों के सामने वे सारे दृश्य विलुप्त होने लगे। चेतन पर अवचेतन हावी होने लगा।
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चेतना लौटी तो सारे दृश्य चकमा देने लगे। चुखा कुआँ, घुटनो में दर्द और जख्म से बहते ताजे गर्म खुन। मुझे स्वयं पर खिझ आया, रोना भी। लेकिन....
उम्मीद की खिड़की खुली। मै हिम्मत करके वहाँ से बाहर निकलने के लिए सोचने लगा। उपर देखा तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा। वो इसलिए कि उपर कुएँ के ठीक किनारे मेरी साइकिल खड़ा था। मै कुएँ मे लगे इंटों के सहारे उपर चढ़ने लगा। धीरे धीरे उपर तो आया लेकिन उपर का भीतरी दिवार प्लास्टर होने के कारण मै सफल नहीं हो पाया और पुनः वापस कुएँ में गीर पड़ा। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि अब मै करूँ तो क्या करूँ। मै एक उम्मीद में कई आवाजें भी लगाया लेकिन मेरी आवाज शायद कुएँ से बाहर निकलते निकलते दम तोड़ देती थी।
कुछ मिनट बीते, कई मिनट भी बीते। तभी अचानक कुएँ के उपर से एक आवाज आया:- "कौन है?"
......मै मौन, डरा-डरा
"इस कुएँ में क्या करने गया है?"
मैने अपना आपबीती सुनाया लेकिन वो माने तब तो, उलटे वह बोला:-"मै कैसे विश्वास करूँ कि तुम कुएँ में गिर पड़े हो।"
तुम्हारा चप्पल बहुत सावधानी से रखा हुआ है और साइकिल भी स्टैंड पर खड़ा है ये कैसे सम्भव है कि चक्रवात तुम्हे कुएँ में गिरा दिया और साइकिल को इंसान की तरह खड़ा कर दिया?"
मै डर और गहरे विस्मय से बोला:- "भाई मुझे बाहर तो निकालो फिर सारी सच्चाई बतलाऊँगा।"
वह व्यक्ति अपने कंधे पर एक चादर ले रखा था, सो उसने अपना चादर कुएँ में दिया। मै बड़ी मुश्किल से उसके चादर के सहारे बाहर निकला। मै ज्यों उपर आया और अपने चप्पलों को देखा तो अचंभित रह गया जैसे मै वास्तव में अपना चप्पल निकलकर कुएँ में छलांग लगाया हो।
वह कहने लगा:-"मै तो सिर्फ यहाँ साइकिल देखा था, इस तरफ आया तो कुएँ से आवाज आ रही थी और अंदर झाँका तो तुम थे।"
मै अपने घुटने से बहते खुन को जब्त करते हुए उस व्यक्ति का धन्यवाद किया और धीरे धीरे घर की तरफ चलने लगा।
घर पर माँ मेरी हालत देखी तो विचलित हो उठी:-" ये सब कैसे हुआ।" मैने जब माँ को बताया तो वह गहरी निःश्वास छोड़ती हुई बोली:- "यह ग्रह का चक्कर था जो टल गया।"
जबकि मै सोच रहा था आपदाएँ अपने कितने स्वरूपों में प्रकट होती है।
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