atit ke kainvas par dosti ke rangअतीत के कैनवास पर दोस्ती के रंग

आलेख   

आज रविवार है। क्या हाल है दोस्तों! आशा है रंगो के इस हसीन मौसम में होली खूब मनाया। अपनों के साथ खूब मस्ती किया। इस पल को प्रेम और सहयोग से इतना खूबसूरत बना दो की आले वाले कल में यह एक खूबसूरत आतीत बन जाए। तो आइए चलते हैं अपने अतीत के शैरबीन में कुछ बना, कुछ सुंदर, कुछ अनोखा देखने की कोशिश करते हैं जहाँ हमसब का बचपन मुस्कुरा रहा है।

  

अतीत का शैरबीन


 अतीत के कैनवास पर दोस्ती के रंग*

उन तस्वीरों में रंग भरना कितना अच्छा लगता है, जिसमें बचपन का कोमल, सरल, चंचल खिलखिलाहट गूंजता है, और बेफिक्री का अलमस्त शोर उत्पन्न होता है। तितलियों के पीछे भागता बचपन, कुतों को दौड़ाता बचपन, अपनी बात मनवाने की जिद पर अड़ा बचपन। कभी किसी को खेल-खेल में हराता और उसपर सीना तानकर चिल्लाता बचपन।


उस बचपन में विविध रंग होते हैं। कई-कई चित्र होते हैं, सपने होते हैं। उस बचपन में माँ की मीठी लोरी भी होती है, तो स्नेह भरा डांट भी। पिता के अनुशाशन में लहराता प्यार होता है तो भविष्य का सही मार्ग दिखाने के लिए फटकार भी। भाई बहन के झगड़े भी होते हैं, आत्मीय प्रेम के मुस्कान भी होते हैं। उसी बचपन मे हमारी मित्रता पलती है खिलखिलाती है। एक विकास करते पौधे की भांति, कभी लहलहाती है कभी मुर्झाती है और तमाम झंझावातों से टकराकर जब उम्र बड़ा होता है, तो उसमें कुछ गाँठ पड़ने लगती है। तने कठोर हो जाते हैं, कुछ-कुछ दरकने लगता है।


बचपन की दोस्ती प्यार, स्नेह, जिद्द की भाषा जानता है। उसमें कोमलता होती है। उसमें भोलापन होता है। वह मानवीय गुणों की भाषा नहीं समझता। सिर्फ सच बोलना जानता है। तर्क देना जानता है। विश्वास करना जानता है। और जरा सा अनबन होने पर दोस्ती कट्टी भी करना जानता है।


आज के आधुनिक समय में या वर्तमान समय में कभी-कभी पत्र-पत्रिकाओं में छपे इश्तहार को पढ़ता हूँ या शोशल मीडिया की खबरों को सुनता हूँ, तो मेरा दिल कराह उठता है कि किसी ने अपने बचपन के दोस्त की बीबी को भगा ले गया या अपने ही दोस्त के बहन के साथ किया दुष्कर्म। मैं सोच रहा हूँ, क्या आज फिर से दोस्ती के मायने समझने होंगे। क्या इंसानियत इतना विवेकहीन और चेतना शून्य हो गया है। हमारी सम्वेदनाएँ, हमारा विश्वास किस गुफा में रो रहा है या मार्ग के किस मोड़पर उसका साथ छूट गया है। इसी उधेड़बुन में मैं अपने सुनहले अतीत में पहुँच जाता हूँ, जहाँ हमारे बचपन के साथ हमारा दोस्ती परवान चढ़ा था।


मुझे याद है, स्कूल के दिनों में मैं हमेशा एकांतप्रिय विद्यार्थी रहा हूँ। तब मेरा कोई दोस्त नहीं था, किसी से घनिष्ठता नहीं था, और मैंने कभी इस बात पर गरज भी नहीं किया। सिर्फ पठन-पाठन से वास्ता रखता था। पढ़ना लिखना या लिखना पढ़ना या खाली समय में जब स्कूल का सारा होमवर्क पुरा कर लेता था तो अच्छे साहित्य को पढ़ना। आज मुझे मालूम हुआ कि पुस्तकें इंसान का सच्चा दोस्त है। और बच्चों की तरह मैं कभी भी खेल में मग्न नहीं हुआ। तितलियों के पीछे भागना, बेर झाड़ना, पेड़ों पर चढ़ना, कुते को दौड़ाना मेरा शगल नहीं रहा। सिर्फ देखता था फूल को खिलते हुए, भौंरे को गुनगुनाते हुए, तितलियों को उड़ते हुए, कुते को भौंकते हुए। अपने परिवेश के प्राकृतिक सौंदर्य को देखना मुझे अच्छा लगता था। उसी देखने मात्र से ही सुख की अनुभूति होती थी। हमारे सहपाठी मुझे हमेशा "पढाकू" कहकर चिढाते। उन दिनों हमारे कक्षा में बच्चों का एक ग्रुप हुआ करता था। साथ स्कूल आने का, साथ-साथ खेलने का, साथ मिलकर कोई शरारती योजना बनाने का और हुड़दंग मचाने का।


एक दिन का वाक्या मुझे याद है। हमारे कक्षा में एक मौलवी साहब गणित पढाते थे, लेकिन किसी कारणवश, लगातार पन्द्रह दिनों तक हमारे कक्षा में अपना विषय पढाने नहीं आ रहे थे। ग्यारहवें दिन कुछ शरारती बच्चे एक गुप्त योजना बनाकर उन शिक्षक महोदय को मारने का विचार बना लिए। फिर क्या था उस दल का जो मुनेटरिंग कर रहा था, मेरे पास आकर अपना आशय बतलाया। चूँकि मैं पहले ही कह चुका हूँ, कि मुझे किसी से दोस्ती या उनके ग्रुप में शामिल होने का आशय कभी नही था, लेकिन मैं अपने वर्ग में हमेशा अब्बल आनेवाल लड़का था, इसलिए वेलोग कोई भी योजना बनाते, उसका मुझे जानकारी जरूर देते। 

     
मैं साफ इंकार कर दिया। इस पर वह गुस्से से तिलमिलाता हुआ मुझे खरी-खोटी सुनाने लगा। बाद में सबक सिखाने की धमकियां देने लगा। मुझे बहुत बुरा लगा। उसके वर्ताव (व्यवहार) पर नहीं (बिच्छु डंक न बारे ऐसा सोचना भी मूर्खता है।) बल्कि नैतिक आदर्श की अवमानना पर। संस्कार की हत्या पर। मैं उसके इस दुःसाहस को रोकना चाहता था। लेकिन कैसे?


दिन का उजाला फैल रहा था। दुब पर टँगी ओस की बूंदें सूर्य के नरम प्रकाश में मोतियों के समान चमक रही थी। किसान खेतों में जा रहे थे या अपने मवेशियों को चारा-पानी दे रहे थे। वृक्षों पर पक्षी रात्रि के थकान को मिटाकर कलरव ध्वनि से मंगल गीत गा रहे थे। कुछ युवतियाँ अपने घर के चौका-बर्तन में लगकर कुशल गृहणी होने का अभिनय कर रही थी। हवा कुछ तीखी धार में बहती हुई हल्की ठंढक का एहसास करा रही थी। मैं प्रकृति के स्निग्ध कोमलता में डुबता उतरता, गाँव के पूरब बड़े तालाब तक निकल आया था। वहाँ मुनेटर महोदय का दल पहले से ही या तो मेरी प्रतीक्षा कर रहा था या कोई नया गुल खिलाने के लिए कतिपय योजना बना रहा था। वेसब मुझे देखते ही घेर लिए। मैं शायद पहली मर्तवा उनलोगों के अनैतिक व्यवहार से चौंका नहीं बल्कि पीटे जाने के भय से काँप उठा। वे सभी मुझे मारना चाहते थे। चूँकि उन सभी लोगों में मैं सबसे छोटा था। वे मुझपर हावी हो रहे थे। आदतन एक-दो थप्पड़ का सौगात मुझे दे भी चुके थे। मैं उनसे वचाव का रास्ता तलाश रहा था। 


तभी तुम किसी देवदूत की तरह प्रकट हुए थे। और मुझे उनलोगों के हाथों पीटने से बचाया ही नहीं अपितु दोस्ती कर लिया। साथ रहने का वादा किया। दोनों साथ-साथ दोस्ती के कस्मे खाए, वादे किए। जाने तुम मुझमें क्या देखा, मेरी वाक-पटुता, मेरा शांत स्वभाव, मेरी प्रतिभा, कुछ था  मुझमें जो तुम्हे रोमांचित कर रहा था। खैर! उस दिन से पता नहीं वह मिलन यकीन में, और यकीन दोस्ती में कैसे बदल गया, पता नहीं चला।


फिर क्या? साथ स्कूल जाना। साथ-साथ पढ़ना। छुट्टी के बाद साथ घुमना-फिरना। हमदोनों का ग्रुप ही अलग बन गया।


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मुझे याद है, हमदोनों जब पहर रात तक पढाई करते थकान का अनुभव करने लगते या नींद पलकों पर आने से मना कर देता, बाहर निकल पड़ते। फिर चाहे रात्रि का गहन अंधियारा हो या चाँदनी का नीरव उजाला। छोटी पहाड़ी की ओर या बड़ी नहर की ओर चल देते। ढेर सारी बातें करते। योजनाएं बनाते। पुरी सावधानी के साथ, सतर्क पहरेदार की भांति सजग। कोई हमारी योजनाओं को भाप न ले। कोई भेद न खोल दे।


तुम्हारे योजना में हमेशा एक लड़की होती थी। उसकी कल्पित सुंदरता होती थी। उसकी अल्हड़ मुस्कान होती थी। तुम उसे पटाने की बात करता। उससे मिलने की बात करता। उसके कोमल मर्मर शरीर को स्पर्श करने की बात करता। और मैं एक चतुर सिपाही की तरह उस योजना का संरक्षण करता। वहाँ कोई डर नहीं होता था। कोई ग्लानि नहीं होती थी। न ही कोई परिणाम की चिंता। सिर्फ एक स्वीकारोक्ति होता, जिसे हमदोनों मिलकर अंजाम देते थे।


समय तेजी के साथ बदल रहा था। समाज बदल रहा था। भौतिक वस्तुओं का स्वाद बदल रहा था। जीवन की अनेक योजनाएं बदल रही थी। और बदल रहा था हमारी दैनिक आवश्यकताएं, महत्वाकांक्षाएँ, विवशताएं। बाजार नए फैशन का रेशमी चादर तान लिया था। सूचना का आदान-प्रदान सेलफोन व इंटरनेट के रूप में आ गया। उन बदलाव के साथ हमें भी बदलना था। सोच बदलने था। आदत बदलना था। जीने का ढंग बदलना था।


उस बदलते परिवेश के साथ परिवार बढ़ा, समाज बढ़ा, हमारी जरूरतें बढ़ी, उन जरूरतों को पुरा करने के लिए जिम्मेवारियां बढ़ी। भले ही वह स्व के हित में हो या सामाजिक सरोकार के उत्थान में। तुम भी घर की जरूरतों को पूरा करने के लिए घर से दूर परदेश जाकर कमाने में लग गया। बच गया मैं। मुझे भी तो कुछ करना था, सो मैं ट्यूशन पढाने लगा। उत्तम आय के लिए कभी-कभी विनम्रता हमारे लिए घातक होता है। खैर समय फिसलता जा रहा था। शुरुआत में तो तुमसे हमेशा फोन के जरिए बातचीत होता रहता था। धीरे-धीरे यह सिलसिला कमने लगा। अब जबकि समय की प्रौढ़ता के साथ दोनों ही अपने परिवार में व्यस्त रहने लगे। और अब तो तुम जब कोई तीज त्योहार पर घर आते थे  तभी हमारा मिलना-जुलना होता था। हाय हल्लो होता। जरूरत की कुछ मामूली बातें ही होता।


मुझे अब महसूस होने लगा है, जैसे हम अपने दोस्ती से दूर होते जा रहे हैं, कभी-कभी अचरज भी होता है। चूंकि आजतक हमारे-तुम्हारे सम्बंधों में कोई खटास तो नहीं आया है, लेकिन उसमें एक उदासीपन, एक थकान, एक घुटन सा महसूस होने लगा है। तुम्हारे साथ बिताए गए एक-एक लम्हे एक एक कर सब धूमिल होने लगे हैं।


मुझे महसूस होने लगा है कि आर्थिक समृद्धि और सम्पन्नता, बिताए गए अभाव के दिनों की कड़वाहट को मिटा देता है। लेकिन स्मृति के कैनवास पर बिखरे रंग को भी क्या भुलाया जा सकता है? जिसमें अपनत्व का, वचनों का, सुखमय पलों का, मधुर संवादों का गाढ़ा रंग चढ़ा हो और जब अचानक आए समृद्धि में उदण्डता का वास हो जाए तो फिर इंसान नही, अर्थ तय करता है रिश्ता। अपने ढंग से समय का मूल्यांकन करता है। उसका प्रगति अपनी भड़कीली भाषा में संवाद करता है।

                ©सुरेन्द्र प्रजापति

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