मैं उस दरख़्त की छांँव छोड़ आयी
कविता श्री की प्रस्तुत कविताएँ स्त्री के सम्पूर्ण जीवनानुभव का सार्थक दस्तावेज़ हैं। इन कविताओं में स्त्री केवल पीड़िता नहीं है, वह साक्षी है, प्रश्नकर्ता है और कई जगह निर्णायक भी।
इनकी कविताओं में स्त्री का सामाजिक, पारिवारिक और मानसिक विस्थापन है। वे अपनी कविताओं में स्त्री के उस जीवन-सत्य को उद्घाटित करती हैं, जहाँ विवाह एक उत्सव नहीं बल्कि संस्कार के नाम पर किया गया त्याग बन जाता है। कवयित्री विवाह को स्त्री की उपलब्धि नहीं, बल्कि उसके जीवन की पहली बड़ी विदाई के रूप में देखती हैं—बचपन से, स्वतंत्रता से और स्वयं से। ‘किंचित रुको प्रिय! (यशोधरा संवाद)’ मिथक रचते हुए समकालीन संवेदना से जोड़ती हुई एक सशक्त कविता है।
‘मैं नारी हूँ!’ एक मुखर और प्रतिरोधी कविता है। इसमें अहल्या, सीता, राधा और द्रौपदी जैसे मिथकीय चरित्रों के माध्यम से कवयित्री स्त्री के ऐतिहासिक शोषण और पुरुष-केंद्रित धर्म एवं सत्ता-संरचना पर प्रश्न उठाती हैं। यह कविता केवल स्त्री-वेदना नहीं, बल्कि स्त्री-चेतना का घोषणापत्र भी है। हम कह सकते हैं कि समकालीन कविता में कविता श्री एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।
कविता श्री की कविताओं में में दर्द केवल भावुकता नहीं है, वह अनुभवजन्य चेतना है। इनकी कविताएँ आत्मसंघर्ष की गहराई को दर्शाती हैं। ये पीड़ा को छुपाते नहीं हैं, बल्कि उसे समझने और उससे जीवन के अर्थ गढ़ने का प्रयास करते हैं। दर्द को दर्द ही रहने दें' समकालीन सामाजिक प्रतिक्रियाओं—मीडिया, न्याय व्यवस्था और प्रतीकात्मक आंदोलनों—पर तीखा व्यंग्य करती है। यह बताती है कि हर दर्द को सार्वजनिक तमाशा बना देना भी एक तरह का अन्याय है। कविता श्री की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और संवेदनात्मक है। आज पहली बार कविताश्री का स्वागत करते हुए बेला हिंदी पर पढ़ते हैं उनकी सार्थक कविताएँ
मेरा ब्याह
बड़े ही जतन किए मेरे बाबा ने,
मुझको ब्याहाने में,
उनकी बिटिया को कोई कष्ट ना हो,
चाहे पांँव में छाले पड़ जाए,
उनके आने-जाने में।
मुझको तो रास आता,
वो खेतों की कच्ची पगडंडियाँ,
लहलहाते खेतों से बातें करना,
पर बाबा ने ढूंँढा,
पक्की सड़कें, मोटर में आना जाना।
मैं चहचाहती चिड़िया उस आंँगन की,
रौनक मेरी चहल-क़दमी की,
पर बाबा ने ढूंँढा,
लंबा-सा घुंघट, मर्यादा की बेड़ियां पांँव में,
तनाव आ जाता उस घर में,
मेरे जोर से हंँसने पे।
मैं सब पर बड़ा हुकूम चलाती,
थोड़ा सा कोई कुछ कहता,
दो आंँसू ढलका देती,
पर बाबा ने ढूंँढा,
हुक्म-नाफ़रमानी होने ना पाए,
चाहे तेरा सर झुक जाए,
आंँसू का क्या है?
सूख जाएंँगे
किसी कोने में दुबक जाएंँगे।
मैं भावों का वेग,
निश्छल मन, निर्मल तन,
पर बाबा नहीं ढूंँढा,
भाव विहीन ठहरा पानी,
महक रही उसमें आनी-जानी,
ज़िम्मेदारी की तपिश में,
सुखा उसका पानी(मन)।
मैंने बाबा से कहा-
"चलो बाबा, घर चलते हैं
इस पथ पर नहीं चलते हैं,"
बाबा ने मेरे दोनों पीले हाथ उठाए,
और देखकर मुस्कुराए
बाबा को मुस्कुराते देख, मैं भी मुस्कुराई,
और फिर, उस पथ से गई ब्याही!
किंचित रुको प्रिय! (यशोधरा संवाद)
किंचित रुको प्रिय!
अभी शेष मेरा श्रृंगार
उलझे केश,,,
सूने नयन
अधरों पर अनकही प्यास
विरह आह्लादित हृदय
दर्प रंजित दर्पण
करता मेरा उपहास
किंचित रुको प्रिय!
अभी शेष मेरा श्रृंगार
अंतिम प्रेम-रंजित दृष्टि से
देखो जो तुम प्रिय
बिखरा मेरा रूप अपार
अशेष वक्त के, शेष राही
अधूरे आलापित मेरे श्वास
ऐसा छेड़ो कोई राग
आह्लादित हो, हृदय के तार
रुको आज की रात प्रिय
हो नयन-मौन-संवाद
किंचित रुको प्रिय!
अभी शेष मेरा श्रृंगार
मेरे मन-मानसरोवर में
प्रेम-राजहंस से उतरे तुम
स्निग्धा दुग्ध चांँदनी रातों में
दो देह एक धड़कन
प्रेम-आलिंगन, महकी साँसे
प्रेम संवाद, केश सहलाना
कैसे भूलें तुम?
देखो प्रिय!
वही दुग्ध चांँदनी रात
काली नागिन-सी डसती आज
किंचित रुको प्रिय!
अभी शेष मेरा श्रृंगार
आज मिलन की अंतिम रात
कल सुहागन मैं, वैधव्य-सी
कौन देखेगा, मेरा मान-श्रृंगार
पुत्र मोह त्यागी
ज्ञान पथ राही तुम
अहोभाग्य, मेरे आज
कल मैं बेचारी नार
किंचित रुको प्रिय!
अभी शेष मेरा श्रृंगार
देती आशीष अशेष तुम्हें
करो जग का कल्याण
मैं अबला नहीं, क्षत्राणी हूंँ
कहो तुम!!!
दे दूंँ शीश उतार
गौतम बन जाते हो
बुद्ध बनकर आना
बनुं अवरोध पथ में तुम्हारे
मुझे लांघकर जाना
हे तथागत!
करो ना विलम्ब, अब जाने में
बेड़ियों-से मेरे अश्रुधार
किंचित मत रुको प्रिय!
त्यागा मैंने अपना श्रृंगार!!
वो घर
मैं उस दरख़्त की छांँव छोड़ आयी,
उस आंँगन में,
अपने पांँव के निशां छोड़ आयी,
गूंँजती है आज भी वहांँ हंँसी मेरी,
मैं अपना हर लम्हा छोड़ आयी,
जाने कहाँ?
मैं अपना बचपन छोड़ आयी।
मैं अपने कुछ ख़्वाबों को,
उस आँगन में बिखेर आयी,
चमक उठते हैं वो
कुछ जज़्बातों में, कुछ एहसासों में,
आज भी जिक्र होता है मेरा वहांँ,
जहांँ मैं अपनी पहचान छोड़ आयी
जाने कहाँ?
मैं अपना बचपन छोड़ आयी।
वक्त के साथ कुछ यादें धुंधली पड़ जाती है,
पर ज़हन से वो जाती नहीं,
चेहरे पर मुस्कान होती है,
पर वो बेबाक हंँसी होती नहीं,
मैं अपनी बिन परो की उड़ान को
उस आसमां के पास छोड़ आयी,
जाने कहाँ?
मैं अपना बचपन छोड़ आयी।
सहर बन रोशन होती है
एक दुआ आज भी,
वहांँ मेरे नाम की शाम नहीं होती
एक अनजान शहर के लिए
मैं उस आसमां को छोड़ आयी
जाने कहांँ?
मैं अपना बचपन छोड़ आयी।
जीवन की सीख
मैंने दर्द को छोड़ा नहीं
पकड़े रखा
ताकि सीख सकूंँ
आत्महत्या के नए तरीके
दर्द ने भी, मुझे छोड़ा नहीं
पकड़े रखा
ताकि सीखा सके
जीवन जीने के
अनेकों तरीके...
मेरी मुक्ति की बेड़ियाँ
जब जुदा हो, मेरा जिस्म रूह से....
अगर मैं दफ़नाई जाऊंँ
मेरे कफ़न के उन पांँच टुकडों में-
पहला रखना,
मेरी उस मासूम मुस्कान का,
जो मेरे बचपन के आंँगन में छूट गई।
दूजा उन आंँसूओं का,
अपने मायके की दहलीज़ छोड़ते वक्त पी गई।
तीसरा उन रीति-रिवाज़ो का,
जिन्हें ओढ़कर, मैं ख़ुद से जुदा हो गई।
चौथा उस खुद्दारी का,
जिसकी हर एक परत बिखर गई।
पाँचवा उस वजूद का,
जो ज़िम्मेदारी की भट्टी में जलकर।
ख़ाक हो गई!!
अगर मैं जलाई जाऊंँ,
मेरे साथ जलाना,
उन बेड़ियों को,
जो रस्मों, रिवाजों और मर्यादाओं के नाम पर,
मेरे पैरों में डाली गई।
उनको घसीटते-घसीटते,
मैं लहूलुहान हो गई।
ना उनकी पकड़ कम हुई,
और ना ही वो घीसी....
और अंत में...
बेड़ियों के निशां चिड़ाकर कहते मुझे-
अभी बेड़ियांँ टूटी है, निशां बाक़ी है
चलता हूंँ मैं भी, अगले सफ़र में साथ तुम्हारे
जिस्म छुटा है, अभी रूह का सफ़र बाक़ी है!
मैं नारी हूंँ!
अहल्या-सी पाषाण मैं
तुम विद्वान मुनि होने का दंभ रखते हो
जानकर भी अपनी भार्या को
तुम उसे श्रापित करते हो
क्यों मैं किसी राम का इंतजार करूं?
किसलिए, मैं पाषाण से इंसान बनूं !
प्रचंड विद्वान वेद ज्ञाता होकर भी
तुम छल से एक स्त्री का हरण करते हो
तीनो लोक विजेता होकर भी
एक स्त्री से ना जीत पाते हो
पर स्त्रीहरण का परिणाम तुम देखो
सोने की लंका भी जल उठती है
अपना कुल नाश होते, तुम देखो!
कर्तव्य का दे वास्ता
तुम प्रेम पथ पर छोड़ जाते हो
द्वारिकाधीश बन, पटरानियों के साथ रहते हो
पर मेरे बिन तुम अधूरे हो
किसी भी युग में तुम चले जाना
तुमसे पहले मेरा नाम आयेंगा
तुम्हें राधा-कृष्ण पुकारा जायेंगा!
केश पकड़े जाते हैं मेरे
भरी सभा में निर्वस्त्र करते हो
विद्वानों की ये सभा मौन रहती है
किसलिए तुम मुझे पांँचाली कहते हो?
एक चीर के लिए
क्यों मैं केशव की पुकार करूं?
जब एक-एक चीत्कार मेरी
बन गूंँजेगी चीखें हजार
उस महाभारत का फिर तुम इंतजार करो!
बेड़िया नहीं बनी, मैं कभी तेरे पांँव की
अगर विश्वास थोड़ा-सा करते तुम
सोता हुआ छोड़कर जाते हो
गौतम बुद्ध बन जाते हो
अगर मैं छोड़कर जाऊंँ तो
किस नाम से पुकारोगे तुम मुझे!
अतः क्लेश के द्वार पर
भावनाओं का मैंने कलश रखा
मैं धकेलती इसे उस ओर
वो धकेलता मुझे इस ओर
असमंजस में हूंँ मैं
जाऊंँ तो जाऊंँ किस ओर
प्रेम, ममता,क्षमा, करुणा गहनें मेरे
इन्हें उतार कलश को लांघकर कर जाऊं कैसे
हर युग की तरह
इस बार भी मैं ठहर जाती हूंँ
क्योंकि मैं नारी हूँ!
क्योंकि मैं नारी हूंँ!!
-
एक परिंदा(स्त्री)
एक परिंदा...
आज फिर उड़ चला
शायद! किसी की तलाश है
दाना-पानी या फिर आशियाना?
उसे तो पिंजरे की तलाश है!
जिस कैद में वो आजाद हो
जहांँ ना जीने की उम्मीद
ना मरने का ख़ौफ
ना दाना-पानी की चिंता
ना सुरक्षा का भय
इस परिंदे को....
एक ऐसा ही,
आजाद पिंजरा चाहिए!!
मेरे रंज-ओ-ग़म की कीमत
मैं बड़ी शातिर निकली
अपने रंज-ओ-ग़म छुपाने में माहिर निकली
मैं इतनी जोर से हंँसी
एक आंँसू टपक पड़ा
उसे चुराकर कोई निकल पड़ा
बड़ी ऊंची कीमत में बिका वो बाज़ारों में
उसकी अदाएगी हुई हीरे-जवाहरातों में
मैं यह देखकर, और जोर से हंँसी
देखो! मेरे आंँसू की कितनी बड़ी कीमत मिली!
मेरे आंँसू की कितनी बड़ी कीमत मिली!!
मैने बड़े गुनाह किए ख़ुद के साथ
मैंने बड़े गुनाह किये ख़ुद के साथ
रोते-बिलखते अरमानों को
ज़िम्मेदारी का खौफ़ दिखाया न जाने कितनी बार
मैंने बड़े गुनाह किये ख़ुद के साथ!
पर्वत से तपते दिन मेरे
आग उगलती रातें मेरी
सब्र की पट्टी आंँखों पर बांँध
आग का दरिया पार किया
न जाने कितनी बार,
मैंने बड़े गुनाह किये ख़ुद के साथ!
मेरी आंँखों का समंदर बेख़ौफ़ रहा
ना डूबी कोई कश्ती इसमें
ना ही कोई मंजर साफ रहा
पर मेरे दिल का झरना बह-बह कर
डूबा जाने कितनी बार
मैंने बड़े गुनाह किये ख़ुद के साथ!
चिराग़ बनकर जलना था फ़ितरत मेरी
मेरे बुझने में दोष नहीं हवाओं का
मैं बुझ-बुझ कर जली, न जाने कितनी बार
मैंने बड़े गुनाह किये ख़ुद के साथ!
मैंने बड़े गुनाह किये ख़ुद के साथ!!
दर्द को दर्द ही रहने दो!
कुछ दर्द को....
दर्द ही रहने दो
बाहर आए तो अफ़वाह फैलेगी
केस होंगे
बहस होगी
अपीलें होंगी
दलीलें होंगी
लाठी चार्ज होगा
कैंडल मार्च होगा
और फिर....
तारीखें होंगी
और...... तारीखें होंगी!
बस! रहने दो
दर्द को दर्द ही रहने दो!!
°°°
-कविता श्री
सूरतगढ़,राजस्थान




