बेल-पत्र : गीतांजलि श्री
बुकर पुरस्कार से सम्मानित, हिंदी के वरिष्ठ कथाकार गीतांजलि श्री की चर्चित कहानी बेल-पत्र
सब्जी बाजार में फातिमा का पैर 'छप' से किसी गिल्ली की चीज पर पड़ा।
"ओफ़..." घिन के साथ उसने पैर को अलग झटका दिया।
"कुछ नहीं है, रीलैक्स," ओम ने झुककर देखा और डालसा दिया, "गोबर है बस।"
पता नहीं क्यों फातिमा के जागते ही इतना गुस्सा फूटा, "देखो, पाक के लिए गोबर फैलाओगे। मेरे लिए वह सिर्फ घिनौना है मोटो रिड्स की लीड।"
ओम के अंदर तक कुछ हिल गया, “फातिमा पागल हो जाएगी।” ऐसी करोगी तो हर बस्ते का दो में एक ही मतलब होगा, हिंदू या मुसलमान।"
"अब भी संभल जाओ," ओम कह उठाओ, "तुम जिसमें किच में डूब रही हो वह अभी भी नहीं है, अभी भी निकल सकता है। पर फातिमा, समझोगी नहीं तो भटकती जाओगी, और वह सॉलिड हो सॉलिड होगी...तुम शामिल हो बच्चे, हिल नहीं पाओगी, अकड़ रह जाओगे..."
दोनों वैगन पर सवार घर की सीमा।
शन्नो चाची आई थी, "ये लो बेटा, शिरडी गई थी, साईं बाबा का प्रसाद है।" “बहू, ये धागा जला लो।”
फातिमा ने रामबाण धागा बांधवा लिया।
उसकी आँखों में अनोखी चमक थी।
उसी शाम उसने अपना सूटकेस खोला। अम्मी ने गुलाबी और हरे गोटेदार साटन में कोमा और जा-नमाज लपेट दी थी। फातिमा ने खिड़की के नीचे, कमरे के एक तरफ सामान रखा। नमाज़ पढ़ी और आसन एक कोने से ज़रा-सा घूम गया।
रात को ओम ने अपना हाथ धीरे से फातिमा के कंधे पर रख दिया। फातिमा ने मुंह फेर लिया। ओम ने और मूल निवासी ने कहा, "फातिमा, यह क्या कर रही हो?"
फातिमा घायल जीव की तरह अलग हो गई, "मैं कुछ नहीं कर रही हूं। राक्षस राक्षस चोर को..." वह चिल्लाते-से स्वर में बोलीं।
अजीब-सी हो रही फातिमा, मानो एक रोबोट-सी पार्ट के नीचे बस 'हिस्टिरिया' ही 'हिस्टीरिया' दबा हुआ हो। जब तक शैले ठीक है, पर जरा-सी आवाज हुई कि पार्ट चटकी और चिल्लाओ फूटा।
ओम ने अपना हाथ हलके से उठाया, “प्यारी, मैं क्या कर रही हूँ?” तुम तो हर बात का मतलब निकाल गये। इतना जल्दी बुरा आदमी हो जाता है। पहले हम हर तरह की बात पर हंसी लेते थे।”
फातिमा की अंतिम पंक्ति में, “पहले की बात मत करो।” पहले हम कुछ और ही थे।" उसने सिस्की के साथ अपना मुंह तकिए में रखा।
ओम ने उसे कस के चिपटा लिया।
"दो मुझे दो छोड़ो, दो को दो छोड़ो!" वह रोटी हुई अपनी बाँहों से गाँव को टोलने लगी।
"नहीं," ओम ने बाहें और कसते हुए कहा, "नहीं फातिमा, कैसे हथियार छोड़ सकती हो। कृपया...! तुम समझ ही नहीं रही..."
समझो तो वह भी नहीं रह रहा था। उसकी मति मारी गई थी। मौंधोते कोई लहर आई थी और उसे मध्य सागर में, आनंद अँधेरों में गोटे खाये गए थे। ये सब क्यों हो रहा है? ये सब क्या हो रहा है? उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. _ सिसकती फातिमा को सीने से लगाते हुए वह मद्धिम चांदनी में पदार्पण कर रही थी। पलंग के बगल में 'कैबिनेट' पर चांद का कब्जा था। फातिमा एकेकी कॉलेज की तस्वीर धुधली-सी शालर रही थी। दुबली-सी लाड़ी, समुद्र तट पर कुर्ता लटकाए, कुर्ते पर एक लंबी चोटी झुलाती, हंसमुख चेहरेवाली, चप्पल नयनोंवाली। तब फातिमा कितना शोख हुआ करती थी। और निडर. और बागी। होस्टललॉक में ही अपने अब्बा से लड़की पढ़ी थी-'समाज...मज़हब...धमाकी मत मुझसे...साड़ी दुनिया सस्ते नियम अख्तियार करे तो भी वे सही नहीं हो जाएंगे।' दोनों ने एक साथ सबका आमना-सामना किया था. जान की खतरनाक देनदारी वाले अनाम खतरों को हिकारत से फाँसी दे दी गई। ओम की नौकरी चली गई। उस पर आरोप है कि वह घमंडी है और ऑफिस की निजी संपत्ति का इस्तेमाल करती है। दोस्तों के साथ दोनों हंसी-मजाक कर रहे थे, क्योंकि बेकार ओम ऑफिस का पेपर, जब-तब अपना आर्टिकल टाइप करने के लिए उठाया था। एक के बाद एक ब्रेकअप हुआ। शहर-भर में बारिश हुई। फातिमा को तो उसके अब्बा ने शश-चाभी में बंद कर दिया। पर वह विंडो से जंपकर भाग आई थी और दोनों ने शादी कर ली थी।
ओम ने गहरी सांस ली। ऐसा लगा था कि एक डरावने दौर का अंत हुआ था, एक खतरनाक कहानी खत्म हो गई थी। पर न जाने कैसे उस कहानी का अंत एक नई शुरुआत बन गया।
सवेरे आँख खोलो तो फातिमा नमाज़ पढ़ रही थी।
“ये क्या?” उसने दाँत पीसकर बोला, “अब यही कसर बाकी है?”
"छोड़ दो मुझे!" फातिमा की आवाज काप रही थी। उसकी आंखों का दृढ़ संकल्प देखकर ओम थारा उठा। फातिमा की आवाज काप रही थी। फातिमा का घर वापस जा।
प्रयोग पर दोनों चुप थे। ॐ अपने चेहरे के आगे कागज़ से हटाएं तो केवल एक और कौर मुंह में डालें। जब फातिमा खाली प्लेटें उठाईं तब वह नहीं रही।
"रुको!"
फातिमा ठिठक गई, सिर बिना मुड़े मुड़ गई।
"जाओ," ओम गुर्राकर बोला, "जब सुनने से पहले ही तय कर लिया हो कि सुनोगी नहीं तो क्या फायदा?"
फातिमा सत्-सत् रूझान फफड़ाती रसोई में घुस गया। उन्होंने कुछ भी सुनने को तैयार नहीं किया था। सारा दर्द, सारी कुंथा, वह अब इसी तरह एक बिंदु पर न्योछावर करने की कसम खा ली थी-आपकी एक पहचान पर, क्योंकि उसे लग गया था कि कोई उसे पहचान नहीं रहा है, कोई वर्गीकरण नहीं है। या तो बस ध्यान देना है या फिर जलील करना है। उसे अपनी अस्मिता की खोज हो आई। ठीक है, वह भी दिखावटी देवी क्या है।
ओम का हाथ फिर उसके कन्धे पर था। “फ़ातिमा !” उसकी आवाज़ रुंधी-रुंधी थी।
फातिमा को परेशान किया। ॐ की कोमलता वह सह नहीं सकती। इसी तरह वह हिलगा देती है। वह आशा करता है और विश्वास करता है कि उस पर विचार किया जा रहा है। यह नैकरी नहीं होनी चाहिए। चीख लो। मार लो. पर...।
“फातिमा, कुछ तो सोचो।” तुम समझो क्यों नहीं हो कि क्या कर रही हो? सारा जग इठलाएगा कि उन्हें तो हमेशा पता था कि तेल और पानी का मेल कब हो गया है...तुम संभालती क्यों नहीं...? हमें एक-दूसरे से प्यार है। धर्म से परे।...तुमने क्यों कहा है कि दुनिया के रचे मूर्ति भँवर में हम चाहते हैं?...तुली हुई हो हमें हिंदू-मुसलमान की गोद में।...फातिमा, तुम जहर को मरहम समझ रही हो। प्लीज फातिमा, प्लीज...। जिसमें से लड़ाके निकल आए थे उस गढ़े में गिर जाना चाहते थे?...हम तो बेइंसाफी से लड़ने वालों के लिए एक सेना बन गए थे, 'सिंबल', 'सिंबल' ऑफ विक्टरी..."
फातिमा तिल ने कहा, “यहाँ-हाँ 'सिम्बल' हैं। बस 'सिंबल' बनके रह गए। मुर्दा 'सिंबल'। और कुछ नहीं रह रहा. जैसे तिरंगे झंडे पर बना चक्र...ओम, मैं इंसान हूं, फरिश्ता नहीं। सुनो ? समझे ?...सुन लो ओम, मुझे मेरी दुनिया चाहिए, इंसानोंवाली।...तुम समझो...। जिसमें तरह-तरह के भिन्न-भिन्न हैं, दूर के, करीब के। मुझे चार जिगरी दोस्तों के साथ नहीं रहना है। ॐ...ॐ, तुम हिम्मत हो...जिंदगी एक जरा-से 'अंतरात्मा' की मंजिल में नहीं जाती। हर पल की यह 'इंटीमेसी'...सब वास्तव में...सब एक-दूसरे के बारे में सब कुछ जानते हैं...। ओम, मेरा दम घुटता है। सांस लेने के लिए थोड़ा दूर देखना है। मुझे यह चाहिए...यह सब चाहिए...''
ओम बोला बोला, 'सब' किसे कह रही हो? ऐसे क्या तुम 'सब' पाओगी? फातिमा, तुम तुम्हें भी ढूंढो। जिसे 'सब' समझ रही हो वे हैं बेजान सिंबल।...तुम डर गए हो...।
फातिमा से वहां से चला गया।
वह सच ही बहुत डरने लगी थी। घाटे में ही बेचैनी की लहर उसके बोझ में डूबती है। रातों को नींद खुलती तो वही जानी-पहचानी आवाजें-नल से गिरती टप-टप डॉयरें, हवा से रिज़र्व-धीमे खड़खड़ाती खिड़की, दूर सड़क पर चलती ट्रक की आवाज-वह अँधेरे में ही डरकर झाँकने लगती...कौन है, क्या है...?
कभी ख्वाब पकाए-अम्मी के कमरे में हुई। अम्मी नौकरानी काम कर रही हैं। कहीं जानेवाली हैं। शरीर पर भाव शांत संयमित है; और फातिमा की प्रस्तुति को तड़प रही है, उनके सुनने को बिलख रही है। पर अम्मी बात ही नहीं करतीं, पथराई-सी हैं। उनका क्या होगा ? फातिमा डरने जैसी, अजीब-सी घुतिन उसे दसने जैसी, वह टूटती हुई। टूट रही है, चीख रही है। चेहरे की हर मजबूत उस चीख में डूब रही है।
अचानक वह जाग गया। उस चीखते, विकृत चेहरे पर यह शांत, स्थिर, सिलवट रहित सोकर जागा चेहरा...। वह और भी अधिक डार जाता है।
फातिमा कुर्सी पर बैठीं। अतीत. उसका स्टॉक चुरा लिया गया था। अपने के नतीजों को नहीं पता था चाहत थी। आदर्श युद्ध अब बहुत हुआ। उसे शामिल किया जा रहा था सिर उठाने की ताकत नहीं रही। हर औषधि के लिए मिट्टी चाहिए, हवा-पानी चाहिए। वह मुरझाने लगी थी। ओम कहा था, कोई उसे हक नहीं कि हर सपने पे जरा और जाए, इतना बेकार साबित हो। समाज से लोहा लिया है तो बंज़र ज़मीन पर उगना। नहीं तो पहले ही किसी बेल की तरह कहीं पेड़ या दीवार से चिपट क्यों नहीं खाया?
बहुत हो गयी ये कोरी बातें। फातिमा का सिर भन्ना उठा। उसे लगा किसी और जिंदगी में वह अपनी इस कालीसी को कोस ऑब्जेक्टिव है। अभी तो बस वह अपनी एक जगह तलाशती है, अपनी पहचान मांगती है, मंजिल पाने के लिए प्रयास कर रही है।
किसी ने घंटी बजाई। फातिमा ने देखी नजर। शन्नो चाची वली.
सोमवार था. चाची हर सोमवार आ जाती थी। अम्मा के नाम की पूजा कर जाती है।
दो अरब अम्मा मुँह फूला के पास बैठे थे। पर बेटे से कौन सी माँ अलग हो जाती है। देखते ही देखते सारी अकड़ चंपत हो गई और बेटे के घर आना-जाना शुरू हो गया। तभी शन्नो चाची भी आ गई।
अम्मा तो फातिमा को जी-जान से प्यार भी करना।
कभी शन्नो चाची ने आखिरी मटकाकर कहा था, "क्यों री, तेरी बहू की आवाज तो बड़ी सुरीली है। बाकी मैं तो आवाज से हिंदू-मुसलमान बताऊं।"
अम्मा ने फातिमा के गाल पर हाथ फेरते हुए कहा,-''मेरी बहू किसी कोने से मुस्लिम है ही नहीं।''
फातिमा ने कहा,- "मैं भी तो सुनूं में क्या रहस्य है?"
चाची ने हाथ नचाया, "भाई मुस्लिमिन हमेशा भोंडी आवाजें ही रखती हैं। एडमियन्स-जैसी! भारी!...वह मालिन नहीं आती है?"
फ़ातिमा ने तपाक से कहा, “आवाज़ तो देहाती, विदेशी के तो आदमी ही औरतों-जैसे हैं, पिद्दे...से !”
बाद में ओम और फातिमा अपनी मित्रमंडली में इस किस्से पर ठहाके मारके हँसे थे। ओम के पांचवें फुट सात इंच के पुरुषत्व की लंबी खानदानी की गई थी। फातिमा ने खुद को फ़तेह कहां फ़नकार को जोशीला गाना सुनाया था।
आये दिन ऐसे किस्से होते थे जो कि लेकर चलते थे किसान भाई-बहनों में। सब मिलकर दुनिया की रीतियों पर ताज्जुब करते हैं। ॐ के बाबा ने कहा था कि जब तुम सो जाओगे और मुसलमान मिल जाओगे तो पहले मुसलमानों का खात्मा करो, फिर सोये का! ओम तब बनिए और पठार का चुटकुला सुनाता कि बनिया थान के घोड़े पर सवार घोड़े पे घोड़े जमाए जा रहे हैं और फफक-फफककर रो रहे हैं कि मंच तो कैसे, क्योंकि वह रुका नहीं कि पत्थर के टुकड़े पर वह पटाखेगा...पत्थेगा...!
कभी ओम फातिमा को मनाओ, “इधर आ मुसल्टी, देखो तो तेरे बदन से कैसी बू आ रही है, पानी से बार करनेवाली?”
फातिमा इतरा के अलग हो जाते हैं, “जा-जा काफ़िर, दो बूंद स्प्रे ले और स्वतंत्रता का राग अलाप।” बड़ा आया, ढोंगी धर्मात्मा कहीं का !”
तब और दोस्त मिल गए, “ना-ना भाभी, संस्थान की बात तो छोड़ो।” वह तो गनीमत है इतनी गर्मी है कि पंख भी नहाना है। पर उसका जो हरमांस खाने वाला जानवर की बू होती है ?"
"हैं ? ये क्या बक्सा है?"
सब हंसते हैं, “क्यों हमारी गाय बनती है?” कभी नहीं. और शेर ? और मुसलता ?"
"और घोड़ा?" फातिमा ताली पीटकर हँसी।
सब बेकार में जुझारू। कभी लोगों के दिमाग पर हंसने वाला, कभी चौंकाने वाला। क्या-क्या नहीं उदाहरण कर देते हैं, कुछ भी मान लेते हैं।
पर शन्नो चाची तो शहद से लीपकर अनसुनी कसीती थी। उन्हें तो 'फिट' करना ही था। लेकिन अम्मा कभी ऐसा-वैसा नहीं बोलती थीं। उन्होंने तो बस एक बार बहू बना ली तो फिर स्नेह ही बरया।
फिर अचानक उनका देहान्त हो गया। ॐ एकदम टूट गया। अम्मा को याद करके छोटे-से बच्चे की तरह। फ़ातिमा भी रो पड़ी। अम्मा याद आतिं। फिर अम्मी और अब्बा का ख्याल भी देखें। न जाने किस हाल में होंगे। इधर-उधर से कोई उड़ती खबर आ गई थी। ख़लूजान के पास गए हैं...नदीम की शादी कर दी...मोतिया का ऑपरेशन हुआ है..., मातमी। बिल्कुल सही कैटेलरी थी उनकी फातिमा। कभी...कुछ हो गया तो...?
ओम ने आमिर की तस्वीर फ्रेम करा के तांग ली। शन्नो चाची ने उसी बगल के आले पर अपने सबसे प्रिय भगवान शंकर की फोटो खड़ी कर दी। कभी-कभार आती तो हाथ जोड़ं। देखते ही देखते वह एक पूजा-स्थल बन गया। पार्वती और गणेश भी आ गए। सामने पीतल की एक तश्तरी में शिवलिंग, गंगाजल, अगरबत्ती और दीया का भोग लगाया गया।
माँ की याद से कुछ ऐसे जुड़े थे ये पूजा कि ओम ने कभी उल्टी नहीं की थी। फातिमा और उसकी आरती भी ले लीजिए और शान नो चाची के दर्शन पर अले की तरफ जूते-चप्पल नहीं जाएंगे।
बहुत दिनों तक चाय नहीं आती है तो ओम अधीर लग रहा है, फातिमा को ऐसा ही था। एक दिन उसने पूछा, "मैं फूल बदल दूँ?"
ओम क्षण-भर चुप चाप बोला गया था, "ठीक है, मुझे अच्छा लगता है।"
फातिमा ने नहाकर चाची की तरह सिर पर पल्लू डाल लिया। केले के पत्ते पर गुड़हल, गुलाब और मोगरा धो लाइ और शिवजी के लिए बेल-पत्र। दूध से शिवलिंग को नहलाया, फूल-पत्र चढ़ाए, दीया जलाया। उसके मन से हूक-सी उठी-'अम्मा...अम्मी...अब्बा...!'
अगली बार बागान में आ कर बोला, “यह पूजा की है?”
फातिमा ने बताया।
चाची कुछ बोली नहीं, हर सोमवार को आ जाओ।
“क्यों बहू, ओम गया?”
"हाँ चाची!"
"और तूने वह धागा तो नहीं उतारेगी? हां उतारना नहीं, तेरी गोद भरेगी।"
"धागे से नहीं चाची, हमारी मोनिका से भरेगी।"
"अरे तो रोमांटिक तो है ही।" चाची ने पूजा के आले पर से घी और चपड़ावे के लिए थोड़ा-सा हलुवा बनाया। पूजा की।
किसी जन्माष्टमी में नीचे के आले को साफ करके कृष्ण-झाँकी भी बनाई गई थी। उस फातिमा ने, जैसे कि अमातृत्व वाला, वैसे सिंघाड़े का हलुवा बनाया गया था। शाम को ओम की बांह का ढांचा तो उसने पूछा, “क्या शन्नो चाय बन गई?” है ?...इतना आसान है। एक दिन में नहीं आ जाता.''
शन्नो चाची पूजा करके चला गया। फातिमा भी बैंक के लिए चल पड़ी। उपज पर लोगों की भरमार थी। फातिमा को लगा, वह सीधी राह में आ रही है और सब उस पर मन ही मन भाना रहे हैं। अपराध-बोध से वह कभी बाईं ओर झुकती, कभी वाम को हटती, और एकाएक रुक जाती...भीड़ को गुजरात जाने दो...।
वह भीड़ से बेहद डरने लगी थी। लोगों से डरने लगी थी। कभी कोई देखने वाला दिखता है तो शैतान तो वह उसे पहचानना भी चाहता है और अगर पहचानना भी चाहता है तो नकली-भरी एक मुस्कान के साथ कतरा के बगल से निकल जाना कि न सामने वाला उसे पहचानना भी चाहता है...पहचानना भी चाहता है...?
ओम झल्ला सिद्धांत, “जहां हैं वहां तो बोलने की कोशिश भी नहीं होती।” लोग समझेंगे खिलजी खानदान का गुरुर है, बादशाहत का गुमान पाले हुए हो।"
"तो मत ले जाओ मुझे कहीं।" फातिमा बाते
ॐ बारंबार अकेले ही जाना। फातिमा से कह-कहके हार गई कि लोग हर बात का टेढ़ा मतलब ही निकालेंगे और निकालेंगे जरूर। उसी दिन मनचंदा ने कहा था, बाला ने कहा था-''देखो, नहीं आई न शहजादी।
लोग कैसा कैसा बोलकर महफ़िल में रंग फैलाते हैं, इसमें ओम और फातिमा को पुराना तजुर्बा था। वह तो शादी की खबर उड़ी-भरी थी कि जग-भर अपने-अपने भगवान का देवता बन गया और फातिमा का रक्षक भी ओम।
"अरे भाई चुप कैसे बैठें, एक सरफराज लड़का बरबाद जा रहा है...वह चंदालाल सोलो के हथियार नहीं बनी...।"
“अमाँ फ़ला-फ़लाँ की ये जुर्रत? हमारी लड़की उठेगी ? देखिये...''
और तो और, अमिताभ बच्चन की मौत पर भी अफवाहों का बाजार गर्म था "देखा ना, तलाक लिया, बेटे का धर्म, मां रो-रो के जान दे घर..."
मनचंदा ने बताया कि इकहत्तर में तो ये शोहरत थी कि फातिमा के बाबा पाकिस्तान के एजेंट हैं। शादी का विरोध तो नाटक है, लड़की को दुश्मन की मदद की नफरत काफिर से ब्याह है, ओम की कंपनी, शायद डनलप के तकियों और ग़दों में एफ.बी.आई. की अंतिम सिलावट थी !
फातिमा चैक अन्यत्र रिटर्न आई।
शाम को ॐ जल्दी घर आ गया। "चलो डमरूपार्क आर्किटेक्चर।"
वहां पहुंच कर दोनों एक घने पेड़ के नीचे, उसकी कंपनी तन से टेक प्लांट में बैठ गए। फातिमा ज़मीन पर एक तहनी सेशन लगी। अचानक किसी सड़क वाले कुत्ते की, वही तनी पर, उसी तन से लग के, एक तांग उठाके क्रिया करने की तस्वीर उसके मन में घूम गई। वह चिल्लाकर ताहनी गिरा दी।
"क्या हुआ...क्या हुआ?" ओम भी घबरा गया।
"व...वो..." फातिमा ने बड़ी-बड़ी इधर उधर की। और फिर खिलखिलाकर मॉक पॉट। सरिता-सी कल-कल करती है उन्मुक्त हँसी।
"फ़ातिमा!" ओम ने उसे गले लगाया।
हँसते-हँसते फातिमा रो पात।
“ओम, मुझे अच्छा नहीं लगता. बिल्कुल सही नहीं लगता।"
"क्या बात है, फातिमा! मेरी जान, अब तो खुश हो जाओ। सब तो अच्छा हो रहा है। तुम अम्मी के भी पास जाने लगी हो।"
अब्बा का तार आया था. उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया था। सख्त बीमार थे। फातिमा बदहवास हाल में मैके सांप था। शादी के बाद पहली बार। बहुत रोना-धोना हुआ। अब्बा जान अच्छे हो गए। पर मुहर्रम शुरू हो गया था। फातिमा ने ओम को लिखा- ''अब्बा घर लौट आए हैं। अब कोई खतरा नहीं है। पर मुहर्रम शुरू हो गया है। उसके बाद ही आ पाऊंगी। अभी ठीक है ठीक नहीं लगता।"
दोनों में ही झगड़ा हो गया। ओम बर्क ने लिखा, "यह हमारा समझौता था कि धर्म से कोई साबिका नहीं होगी, उसके पचडोड में बिल्कुल नहीं पड़ेंगे।"
फ़ातिमा ने आश्चर्य से कहा, "तुम तो ग़ज़ब ही करते हो ओम। मुझे धर्म से अभी भी कुछ वास्ता नहीं है। अब्बा बीमार थे। अम्मी का जी खराब हो गया। मेरे लिए नौहे पढ़ाई से उन्हें राहत मिली। बस। मुझे कोई सहमति नहीं है।"
"वाह-वाह," ओम ने लाल-पीले सारा ताना कसा, "तुम रोजा दिखाते हो, माँ करो, और फिर मासूमियत से कहो, क्या गलती हुई? फिर क्यों न अम्मी के दिल के सच के लिए भी कर लिया गया? क्या गलतियाँ हुईं?"
फातिमा ने बहुत गहराई से ओम की तरफ देखा। दो क्षण बाद शांत स्वर में बोली, “हाँ शायद ग़लत नहीं होता। हमें फिर भी अम्मी और अब्बा को इस तरह मिल जाता है, हमारे रिलेटिव शेयरहोल्डर का ज़रिया मिल जाता है। मुझे इस तरह की अलग तरह की जबरदस्ती नहीं करनी चाहिए।...भाई की शादी तक में शरीक नहीं हो पाई।...तुम्हारे...हिंदुत्व की वजह से।''
ॐ सन्नते में आ गया, “अरे ! दो दिन उस सम्राट में लौट आए और दिमाग फिर गया? मैंने क्या कहा था? या किसी भी धार्मिक जुलूस से? बोलो. मंदिर, मस्जिद, गिरजा..." ।
"खूब रही," फातिमा बीच में ही बोल उठी, "अब मंदिर और फेरों की बात होगी। मंदिर पर कौन-सा कलंक लग रहा था? आप जानते हो, अच्छी तरह से, जानिए कि हमारे इस समाज में जो भी जाता है, लड़की जाती है। लड़का बस जाता है।...तुम्हारे हिंदू मजहब की तरह...दूर-दूर तक अपना साया रखता है, अपनी छतिया में लकड़ी को पलटाता है...या दुस्साहस है...मैं...पर ये खूब तो रही है अपनी लगन से बाकी कोई दूसरा ज़रा-सी पनाह माँगे, होने का हक माँगे, कच्ची ज़मीन तो गहरा उठें ऐसा है तो हमें भी शामिल करें उल्लू क्या बदला या उधारा?
ओम का हाथ उठ गया था, "अब ऐसी हालत देखेगी? और यह जटाओगी कि जैसे मैं हथियार उठाने के ले आया? अपनी रजामंदी का समर्थन लेना अब डर लग गया है।"
फातिमा रोने लगी। पर बोलती रही, "रज़ामंडी? क्या निकाला था? या तो इस तरह आओ, अन्यथा जाओ, फूटो, मरो। जाना क्या आसान होता है?"
"फातिमा", ओम चिल्ला ने लिखा था, "इस तरह हमारे अतीत को मत झुठलाओ, हमारे प्यार को दुषित मत करो।"
ओम ने फातिमा को गोद में लिया, “अब क्या है?” अब तो तुम हर साल अपने घर जाकर पढ़ते हो।"
फातिमा भर्राई की आवाज में बोली, "जाति ही तो हां बस। क्या नाता रख पाई हां किसी से? क्या दे रहे हैं उन्हें?...ओम, मैं समाज से लड़ाई की थी, वह मुझे बदनाम करे, मेरा बहिष्कार करे, मैं सब सह सकती थी। मां-बाप से अलग होना..."
ॐ विचारमग्न हो गया। माँ-बाप से अलग कौन-सा समाज होता है? क्या कोई समाज है?
उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा, "नहीं, फातिमा, हम याचिका नहीं कर सकते। जगदीश काका को याद करो।"
जगदीश काका फातिमा को अंग्रेजी पढ़ते थे। वह अकेले बुज़र्ग थे जो उन दोनों की शादी में शरीक थे। शादी से पहले उन्हें भी दे दिया कहा- “देखो, इस समाज की ताकत को मामूली न समझो।” उसके बारे में अपनी नियत तय कर लो। बहुत थू-थू होगी, ये समझ लो। वो चिंतित हो तो सोच लो। दुनिया के आगे किरकिरा मुस्काता उछाले लोगे, जगह-जगह चूर-चूर होते हुए। झेल सकते हैं, खुलासा है, तो आगे बढ़ो, हम सबके साथ हैं। यह नकली भेदभाव तुम बच्चों के साथ ही मिट जाओगे। 'पर फिर ठीक से समझ लो, जाने दो जो होते हैं...नाम, खानदान...किसी का गम न करो।'
"फातिमा," ओम ने अपने सिर को अपने दोनों हाथों में ले लिया, "समाज को हरा दिया और अब लड़खड़ा रही हो!"
"तम्हें क्या," फातिमा ने अपना हाथ घुमाते हुए कहा, "तुम्हारी माँ, फ़े अरेस्ट, सब लोग ही रहे। तुम अपने ही रह रहे हो।"
ओम ने ज़रा झुंझलाकर कहा, "तुम्हारी अम्मी की चाहत भी स्टार न मान पाईं तो ये उनकी बेकार है, मेरी मां को क्यों कोस रही हो?"
फातिमा को बुरा लग गया। वह चिल्लाकर बोला, “तुम समझ नहीं पाओगे। लड़का हो...हिन्दू हो....तुम्हें क्या डर ?"
"ओफ़्फ़ो!" ओम ने सिर पकड़ लिया, “अब इस तरह की बातें दिलचस्प हैं। जब समाज के सस्ते ढांचे से ऊपर उठ गए तो उनके तुला पर हमें क्यों तौलिए? लड़का, लड़की, हिंदू-मुसलमान!"
"कहना आसान है," फातिमा का गुस्सा बढ़ने लगा, "तुम ऊपर उठ गए और अलग हो गए।" सुरक्षा शुरू से यह छुट्ट था। पर मुझे तो हर कदम पर समाज के बाण सहने वाले किरदार हैं। जमादारिन है तो मेरी पूछती है, आगे तो मुंह नहीं खोलती। गलत उस जिगरी दोस्त की पढ़ी-लिखी बीवी तक, जबकि पुराने अदब से बोलती है पर मेरा 'हेलो' भी नहीं करता। किसी ने पूछा तो सही कि ये सब नापसन्द है तो मुझ पर ही अंतिम संस्कार करने की तमीज़ क्यों? जैसे मैंने ही तो ये सब किया है, तुम तो दूध के धोले, सिनदास चित्ररे हो।...धोबी तक जानपूछ कर मेरा काम देर से करता है..." फातिमा की सिसकियाँ बाँधने का काम।
"छोड़ो फातिमा," ओम ने टोका, "हम लोगों से कब कोई दूसरी उम्मीद की जाती थी? उनकी निर्दयता, उनकी निष्ठा, निरंतरता तो देखते रहते हैं। छोड़ो उनकी। ये छोटी-छोटी संस्थाओं में सिर खपाती क्यों हो?"
“यही तो मैं समझ गया हूँ,” फातिमा चिल्लाई, तुम में नहीं रही, “क्या ये छोटी-छोटी लड़इयाँ ही असली हैं। बड़ी लड़ाई सब आसान है। हम उन्हें अभिमान से उखाड़ फेंकते हैं, उनके लिए अभिमान से मर-मिटते हैं। इतनी छोटी होती हैं कि बड़ी-बड़ी रूमानी रोबदार लड़इयां से जुड़कर देखना मुश्किल हो जाता है...तुम्हारी लड़ाई बड़ी है। लड़ो और चाटो बड़ी लड़ाई की बड़ी जीत को। उसकी तो हार में भी घमंड है। पर मैं...मुझे...इन छोटी-छोटी लड़कियाँ ने बड़ी के लिए सात नहीं छोड़ा है...मैं..."
"ये हमारी हार है फातिमा! कोई वजह नहीं कि हम तुम...तो...तुम..."ओम घोर विनाश में हकलाने लगा।
“मैं अब कुछ नहीं जानता।” बंद करो” फातिमा ट्रस्ट हो चुकी थी।
ॐ का हृदय कराह उठाओ। फातिमा डूब जायेगी. हम दोनों मिल जायेंगे। अपनी बेकारी से बेइन्साफ़ी को बढ़ावा दे रहे हैं। अन्यायियों को मसाला मिलेगा, वे चटखारे ले-लेकर दुनिया को ये नमूना सबूत के तौर पर पेश करेंगे।
किसी तरह संभालना...संभालना...होगा। जगदीश काका... । क्या करें? कहाँ?
शहर छोड़ें ? रोज़ के लिए कुछ स्वादिष्टाने निकलें ? उटी ? दूसरा हनीमून ?
ऊति ही तो जा रहे थे जब वह मोटी मिली थी जो मुल्ला को देखने वाले असली हो गए थे। लेडीज़ केबिन को रेलवे वालों ने जनरल डब्बा बनाया था। उसी में ओम और फातिमा को जगह मिल गई थी। ओम अभी प्लेटफॉर्म पर खड़ा था और फातिमा सामान के साथ घरेलू सामान था। सामने गहनों के भार से यफ़्फ़ती एक मोटी ज़मीन थी जो 'लेडीज़, लेडीज़' चीख पड़ी थी, जैसे ही एक मुल्ला अपनी पलटन लेकर डब्बे में घुसे। फातिमा ने अपने चेहरे पर हवाइयां उड़ाते हुए मामला स्पष्ट किया। मल्ला-टोली सामान बाहर निकल गया तो मोटी फुसफुसाने लगी थी, 'बेटी, ये तो खतरनाक बात है।'
फातिमा ने सूर्योदय दी कि नहीं बहुत लोग साथ हैं, डरने की क्या बात है? मोती के तो सच फाख्ता हो गए थे। नहीं बेटी, ये 'एम' लोग हैं।' उसने चारों ओर से दौड़कर युफटे को देखा और फिर जो अपने बदमाशों का नाम दिया था उसमें कोई करतूत नहीं छोड़ी थी जो लोगों का रास्ता न हो। फातिमा ने बहस करते हुए कहा, 'मुझे भी अंदाज है, मैं खुद 'एम' हूं।' मोटी को रात भर नींद नहीं आएगी। सवेरे-सवेरे फातिमा गथरी की तरह सीमेंटकरंड में थी जा रही थी कि ऊपर के 'बर्थ' से मुल्ला का चैदह-पंद्रह बबूल का लड़का उतरकर बोला था, 'दीदी, चार्ट ले लो, मेरे पास दो हैं।' मोटे असली नजारों से देख रही थी।
"चलो घर आर्किटेक्चर।" ओम ने फातिमा का हाथ पकड़ लिया। फातिमा पर उन्होंने रोक लगा ली। आस-पास कोई नहीं था। ओम ने फातिमा की आंखों में झांका। वहाँ अँधेरा ही अँधेरा था।
“फातिमा, कोलोमोथेलोप्लास्टी। मैं छुट्टी ले लूँगा। ऊटी चलेंगे। फातिमा मैं समुद्र तट पर खुशियाँ देखना चाहती हूँ। फिर से । हरा-भरा...''
ओम की भतीजी की शादी में फातिमा ने हरी पोशाक पहनी थी। अनायास ही ओम के मुंह से निकल पड़ा था-'ये क्या मुस्लिमी रंग लेंगी?'
फातिमा के मूड कांपने लगे थे-'चुप हो जाओ ओम, बस इसी तरह चुप हो जाओ।'
ओम उसे बताना चाहता था कि उसका ऐसा-वैसा कोई मतलब नहीं था। ये सब अन्वेषक में, न जाने कहाँ की सुनी-सुनाई बातें, कहाँ की बसी-बसाई प्रतिक्रियाएँ हैं जो यों ही, सहज भाव से अनायास निकल आती हैं। ओम फातिमा के पीड़ित मन को फिर से 'मुसलमान हरा' करना चाहता था।
"हँसो ना मेरी जान।"
फातिमा की आँखों में थी घुड़कियाँ। कैसे सोना चाहती थी, इतनी उलझी हुई। ॐ को लगा कि अब प्लास्टर के लिए खीचें, या छोड़ें दो या कस्ती जाने दो, नतीजा एक ही होगा-टूट मोशन।
नमाज़ का वक़्त हो गया था. फातिमा को धोखा दिया गया।
ॐ अब चुप नहीं रह पाया। उसने लपककर उसे पकड़ लिया, "तो यही कहो न कि अब इसी तरह के दायरे में जाओगी और मैं पास न दूं।"
फातिमा की तो नाक पर जैसे गुस्सा आ गया, "और तुमने जो दिया जलवाते हो?"
"मैं...मैं जलता हूं? झूठ-सच किसी से मतलब नहीं? अब आने वालों से कह दूं कि घर में अपने भगवान का नाम न लो?"
"नहीं, मत कहो। किसी से ना कहो। मुझसे भी नहीं।"
ॐ स्तब्ध दृष्टि रेः।
जा-नमाज का कोना मुड़कर फातिमा फिर बाहर निकल गईं। सरपट-सरपट भगती-सी चाल में जा रही थी, लेकिन ऐसे नहीं कि किसी काम की जल्दी हो गाड़ी और छूट रही हो, बल्कि ऐसे किसी से भाग रही हो। असलियत-सी. बौखलाई-सी. किसी कंपनी के हर कान को किसी भी तरह के विकार में कैसे-कैसे मनोरोगी ले लिया गया कि कोई उड़ता हुआ भाव न आ जाए, किसी को अलग न हो जाए, और अधिक किस तरह की वस्तु की तरह उसका चेहरा तनते-तनते दिखा।

