sukhi ret par ek bund: सुखी रेत पर एक बुंद

   उपन्यास अंश  

यह बिल्कुल नई और कुछ अलग तरह की कहानी है. 

और इच्छाओं का एक रीबन उघरता है...




जिस भाषा में बचपन की मासूमियत कौतुक करती है, सहेजती है अंकुरित होती जिज्ञासा को, बेपरवाह अलमस्ती का गीत गुनगुनाती है,  जरा सी चुक हुई कि अंगुलियाँ चीर देती है, घायल करती है. संघर्षों में तपाती है, ललकारती है और अंत में हत्या कर देती है. उसी भाषा का फहराता हुआ, लहराता हुआ, खेलों में रमता हुआ और हँसता खिलखिलाता हुआ शब्द...




एक शब्द का कोमल बिल्कुल नाजुक पुष्प. अलसाया हुआ, झल्लाया हुआ, अपने आपसे एक संवाद बनाता हुआ. अपने अंदर उमग रहे इच्छाओं से भरा हुआ. प्रभात की नवीन किरणों से एकदम  तरोताजा. उड़ान भरते परिंदे के पँख अपने ही रहस्य को जानती है. उसके अंदर विस्तार लेता है उसके अनंत और सजीव सपने. 


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हवा के मौन बहाव के साथ नन्हा पुष्प हिलता डुलता, शाखाओं को विस्तार देता हुआ, जडों को मिट्टी की नमी में तर करता हुआ. परिचित अपरिचित चेहरों को लुभाता हुआ, बुलाता हुआ पेड़ की चक्करदार छाया से थक जाता है. परिचय का सुगंध उसके कोमल आलिंगन से उसके फुनगियों पर चहकते हुए स्वरों से, चिर परिचित, स्पंदनो से खेलना, एक नैसर्गिक जीवन का खेलना है. और ऐसा होता है कि पेड़ चरमरा कर गिरता है और तने अलाप करते हैं. नहीं... नहीं...




कुछ नया रचने, अपनी कोमल इच्छाओं को नया आयाम देने, अपने स्वरूप को नया आकार गढ़ने, एक नए उत्सव में शामिल होने. कुछ अलग स्वर,कुछ अलग कोमल मन की अनुभूतियों, गंध, आकर्षण, निर्मल पुकार, कुछ-कुछ उत्थान, कुछ-कुछ पतन. 




मंथर गति से चलने वाली हवा पलास के फूलों से सरसरा कर गुजरती हुई एक मोहक संगीत को रचती है, जो सुनने वाले का थकान मिटा देती है. पलकों पर सवार निंद्रा और मदहोश हो जाता है. बारिस की बुंदे टपकती है. टप-टप-टप... और बूंदों का टपकना जैसे मन में कुछ टपकना होता है. बिजली का चमकना जैसे रह-रह कर मन में कुछ चमकता है, जैसे एक गहरे रहस्य में उम्मीद का चमकना. उसके कुछ फांक छिटक कर हृदय के छिपे तारों को छेड़ देता है. कुछ डर, कुछ उल्लास, कुछ कौतुक, कुछ विलास. कुछ टुकड़े के शक्ल में छिटककर पुनः-पुनः फड़फड़ाता है.  इच्छा का एक रीबन उघड़ता है. हवा और बूंदों, और बिजली की चमक को बाँधने.




बाँधने के लिए एक उल्लास भी शामिल होता है. निरुदेश्य उमंग को बिना कोई भेद भाव के निमंत्रण देता है. विविध रंगों में कौतुक कथाएं चकित करती है, उत्सुकता भी जगाती जो और ज्ञान वर्तूल खोलती है. एक गाँठ बाँधने, एक संगीत के सुरों को साधने, एक नया सृजन करने. 




यह वही चिर परिचित दरखत है, जिसे आप देख रहे हैं. जिसके खूब सघन और विस्तृत छाया में तास के पत्ते फेंके हैं. जहाँ पीड़ा की थकान को उसके शाखाओं पर लटकाए हैं.  घुमड़ते हुए बादलों की शक्ल में धुएँ का गुब्बार छुटता है. डंठलों, शाखाओं और कोमल हरियाती पतों पर सरकती हुई मुस्कान। उसकी ऊँची शाखाएँ और फुनगियाँ हाथ की उँगलियों के समान चन्द्रमा से वार्तालाप करता, चंचल छिटकी रौशनी में नहाता हुआ, एक नये एहसास को पैदा करता हुआ, बिल्कुल एक स्पंदन सा, एक छुअन सा.




कल्पना का चलचित्र चलता है. मस्तिष्क में  आकार लेती अज्ञात दृश्यावली कुछ जानने के लिए उत्सुक करता है. मन का कैमरा उछल-कूद कर तस्वीर खींचता है. साँसों का स्पंदन शुरु होता है, रेंगता है स्वर, एक लय उत्पन्न करता है.


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(अगले अंकों में जारी)

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