कहानी
जनतंत्र के भेड़िए
सदर अनुमंडल से जानेवाली मुख्य सड़क के दाहिने तरफ एक कच्ची सड़क जाती है, महुआ ग्राम तक; जो पिछले वर्ष प्रधानमंत्री सड़क योजना से जोड़ दिया गया है. गाँव के दक्षिण एक विशाल आहर है, और आहर से सटे एक विशाल पट्टीनुमा परती भूखण्ड. जो पहले पुरे गाँव के भूमिहारों, यादवों, बनियों के घर से निकला कूड़ा करकट का शरणगाह था. लेकिन गाँव के भुइयाँ टोली के लोग पहले वहाँ सूअरों का बाड़ा बनाए. फिर धीरे-धीरे झोपडी बनाकर रहने लगे. इसपर भूमिहारों और यादवों ने अपना हक हकीक बताकर मुसहरों, और चमारों से तीन तीन बार मारपीट किया और इस आपा धापी में कई-कई बार इनके झोपड़ियों में आग लगाया गया. इस उपद्रव में दो तीन जनों की जाने भी गई. जब भी मुसहरों को लगा कि अब जमीन छोड़कर भागनी पड़ेगी तब तब पारस मालाकार उन हरिजनों को एकत्रित किया और दहाड़ कर बोला- "तुम भागने लगोगे तो जानवरों की तरह खदेड़ दिए जाओगे. अड़ जाओगे तो कम से कम जीना सीख जाओगे. डरो मत, तुमलोग किसी के जागीर में नहीं, सरकारी जमीन में रह रहे हो. मुकाबला करना सीखो तभी जीत पाओगे."
उसके इसी आह्वान पर भरोसा करके वहाँ के बच्चे बच्चे उठ खड़े होते हैं. वे सभी पारस मालाकार को अपना नेता मानते हैं. कोई सम्मान से कहता- "पारस भाई! तुम हम सब गरीब के भगवान हो."
पारस एक गरीब भूमिहीन का बेटा है. जिसके बाप को गाँव का जानकी यादो इसीलिए पीट पीट कर जान ले लिया था, कि वह गाँव में समानता की बात करता था. गरीब गुरबों के हक अधिकार के लिए आवाज बुलंद करता था. जानकी यादो गाँव का दबंग आदमी था. बीस बीघा जमीन का मालिक. दरबाजे पर ट्रैक्टर. गाँव के गरीब गुरबे या साधारण लोग किसी आफत विपत में उसके सामने जाते थे. हाथ पसारते थे. गिड़गिड़ाते थे. और वह वैसे ही उन्हें सहयोग, कुछ रूपये पैसे दे देता था जैसे वह सहयोग नहीं अपना अभिमान सौंप रहा हो. इसीलिए पारस मालाकार के बाप के हत्या के बाद पुलिस के सामने कोई भी व्यक्ति गवाही देने के लिए तैयार न हुआ. खैर सो बात बीते युग के अध्याय में बंद होकर रह गया. अब पारस मालाकार अपने बाप के ही नक्शे कदम पर चल निकला. कुछ लोग उसे वियोग में जिद का दुदुम्भी मानते थे, तो कुछ उसके इस मूर्खतापूर्ण साहस में नियति का खोट. वह अपने बाप के ही आवाज को बुलंद करने में लगा हुआ है.
वह कहता है--"वह बेटा कैसा जो अपने बाप के सपने को पूरा नहीं कर सकता." उसका प्रिय और क्रान्तिकारी कथन था- "जागो संगठित हो जाओ और आगे बढ़कर तबतक लड़ो जबतक तुम्हें अपनी मर्जी से जीने का अधिकार न मिल जाए."
वह जमीनी सच्चाई की वकालत करता है. सही को सही और गलत को गलत बोलता है. बिचौलिए को छककर गरियाता है. इसीलिए वह एक निर्भीक और कुशल वक्ता है. वह जमा पूंजी का खिलाफ करता है. किसी भी तरह के मानवीय शोषण का खिलाफ करता था. वह अक्सर कहा करता है-"मनुष्य को मनुष्य पर वगैर उसके मर्जी के दबाब बनाने का किसी को कोई अधिकार नहीं. वह समानता की बात करता है. वह मार्क्स की बात करता है. वह असहाय और वंचित लोगों को अपना अधिकार के लिए एकजुट होने की बात करता है. इसीलिए वह भूमिहारों और यादवों की आँखों में खटकता है. भूमिहार, यादव, बनिया, कायस्थ, ब्राहाम्ण उसे जेहादी समझते हैं. और हरिजनों वंचितों को अकारण जब तब उकसाने का उसपर आरोप लगाते हैं. लेकिन हर बार उसके साथ वैभव सिंह का बेटा आलोक उनसब को ललकार कर स्वयं को पारस के साथ खड़ा कर देता है.
पारस और आलोक दोनों सहपाठी हैं. दोनों कॉलेज तक साथ पढाई किया है. आलोक हिंदी साहित्य से स्नातक कर शोध संस्थान में चला गया था। (भारत में आदिवासी समाज और उसका संघर्ष विषयक पर शोध ) जबकि पारस अपना प्रखर और प्रभावी वक्तव्य की बदौलत छात्र यूनियन का नेता बन गया था।
लगभग दो सप्ताह से महुआ के हरिजन टोला में एक लहर चल रहा है जिससे वहाँ के लोगों में अशांति और भय का माहौल कायम हो गया.
उनलोगों की सबसे बड़ी समस्या ये है कि इन दिनों पारस घर पर नहीं है. वह कुछ जरूरी कामों से राजधानी गया हुआ है.
कुछ लोग बेहद क्रुद्ध हैं. कुछ लोग हारे हुए जुआरी की तरह बेवस और लाचार. उम्मीद की किरण तलाश रहे हैं. भूमिहारों में फिर से जोधा सिंह और करतार सिंह हरिजन टोली में जाकर खुली चुनौती दे रहा था क़ि जल्द से जल्द वे सब इस जमीन से अपना दखल कब्जा हटावें, नहीं तो कानूनी कार्यवाई की जाएगी. और बाद में जो जान माल की क्षति होती है उसके वे खुद जिम्मेवार होंगे. इस घोषणा से सभी लोग घबरा गए. बच्चे, बुढ़े, नौजवान, स्त्रियां सभी आपस में लामबन्द होकर खुसर फुसर करने लगे हैं. अब क्या होगा. सभी आपस में एक दूसरे को देख जल्द से जल्द इसका युक्ति ढूंढ रहे थे. उनकी आँखे दिन दिनभर प्रतीक्षारत रहने लगा कि इस मुसीबत की घड़ी में कहीं से भी पारस आ जाए.
पारस हरिजन टोली का शक्ति है. उनसब का विश्वास है. उसका हौसला है और उसका एक जागृत नेतृत्व. नेतृत्व विहीन सेना वैसे ही विनाश हो जाता है जैसे बिन पायलट का जहाज. युवकों को कुछ कुछ यह भी संदेह होने लगा था कि कहीं पारस के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गया है. क्या पता कोई धोखे से उसके साथ भी.....??? करतार सिंह के बारे में पूरा गाँव जेवार जानता है. उसके कथनी और करनी में कोई विशेष अंतर नहीं है. पिछले साल भी बीडीओ के मिलीभगत से बोधा, सुक्खू, केदार का प्रधान मंत्री आवास योजना का पैसा हड़प लिया था. और बस्ती में घूम घूमकर गरजता फिरता था कि प्रधानमंत्री आवास का पैसा हड़प गया हूँ. जिसने भी माय का दूध पिया है, हमसे बात करे. जिगर चाहिए, जिगर।" लेकिन किसी ने भी उसके खिलाफ एकजुट होकर आवाज नहीं उठाया था.
"अब क्या होगा?" तरबना में कुछ लोग बैठे हुए आपस में खटर पटर कर रहे थे. गिरधर कह रहा था- "हम सबको जमीन का जिला के तहसील से परवाना मिलेगा. लेकिन भगवान जाने अबतक क्यों नहीं मिला. इस विपत की घड़ी में पारस नहीं है. कहाँ जा सकता है; उसके साथ क्या हो सकता है.
तरह तरह की आशंका के अदृश्य सर्प अपना फन उठा रहा था और वेलोग आतंकित हैं.
"करतार है बड़ा जालिम किस्म। कहीं ले देकर पारस को ठिकाने तो नहीं लगा दिया." गोपाल तर्क दिया.
"चुप बे! बेसिर पैर बार मत किया करो. पारस कोई फोफी नहीं है जिसे जो जब चाहे बजाले.' बोधा चिढ गया था.
गिरधर बड़ा गम्भीर था. बोधा उसे टोक दिया- "गिरधर तुम क्या कहते हो. पारस के साथ तुम्हारा खूब पटता है. कभी कुछ बताया नहीं."
"नहीं यार! लेकिन हमें इतना हताश होने का कोई मतलब नहीं निकलता. पारस आज न कल जरूर आयेगा. मेरा विश्वास कहता है. तब तक कुछ बुद्धि अक्ल से काम लो. उसने क्या कहा था-"उठो, संगठित हो और आगे बढो!!" तब तक हमलोगों को हिम्मत से काम लेना है. कल सुवह ही सभी लोग यहाँ इक्कठा हो जाओ. फिर सभी सदर अनुमंडल चलो. कुछ औरतों को भी ले लो. वहीं चलकर फरियाद करो. फिर जो होगा देखा जाएगा. हाथ पर हाथ देकर बैठे रहने से कोई काम नहीं होगा. अब हमीं को कुछ करना होगा. पारस हम सबको क्या सिखाया था- हर घर में भगत और सुखदेव हैं. ये हम सबका युद्ध है. ये युद्ध अपने बलबूते लड़ना होगा." गिरधर बड़ी तन्मयता से बोल रहा था।
"ठीक है तो आज ही शाम तक पूरे मोहल्ले में घूम घूम कर बता देते हैं. गिरधर तुम्हारा बेटा कुछ लिखपढ़ लेता है. उससे वो काउन पत्र होता है...?
"आवेदन पत्र!' गिरधर बतलाया.
"हाँ- हाँ वही लिखवा लो."
तभी वहाँ पर बुधन राम आ टपका-"का हो! का खुसर फुसर मचा रहा है."
"कल सबको सदर अनुमंडल चलना है."
"और अगर करतार और बोधा सिंह को पता चल गया तो सबको भीतरे धकेल देगा." बुधन राम शंका जाहिर किया.
"तो भाई जिसे उनलोगों से डर है वह यहाँ सबकुछ छोड़छाड़ कर चला जाए या अपने घर को स्वाहा होते देखे." गिरधर घोषणा किया.
बुधन राम चुप हो गया.
"काहे अब बोलता काहे नहीं है."
उसी शाम पारस आ गया. पुरे मुहल्ले में ख़ुशी की लहर दौड़ गई. सबकी उम्मीदें खिलखिलाने लगी. जो भी लोग सुने उसे घेर कर बैठ गए. गिरधर सारा समस्या कह सुनाया. पारस भी गम्भीर हो गया फिर बोला-"फिलहाल इससे घबराने की कोई जरूरत नही है. तुम सब तय कर लिया है तो ठीक है. हम जिला मुख्यालय गये थे. ज्ञापन सौंप दिया है. वहाँ से उम्मीद है कि हप्ते में सबका परवाना निर्गत कर दे. उससे पहले एक जांच कमिटी आएगी. बीडियो साहब आएँगे."
"तब तो ठीक है फिर अनुमंडल जाने का क्या फायदा." गिरधर बोला।
"नहीं भाइयों अगर इरादा बना लिया है तो चलो. ताकि बिचौलिए को ये तो पता चले कि हम डरे नहीं हैं. हम भी अपने अधिकार को समझते हैं."
"पारस भइया; अगर आप कह रहे हैं तो चला जाए. हम सब तैयार हैं.
दूसरे दिन खूब सवेरे ही सब तैयार होकर बड़े बरगद के नीचे एकत्रित हुए. कुछ महिलाएँ भी आ गई थी. सभी लोगों में एक अद्भुत उत्साह था. कुछ भोर भिनसारे से ही इकट्ठा हो रहे थे. सुवह हुई. भूमिहारों, यादवो को भी पता चला कि सभी हरिजन लामबन्द होकर कहीं जाते हैं.
करतार सिंह सूना तो आग बबूला हो गया- "साला परसवा! बाप के गांड में लाठी ठूस ठूस कर मारा गया था. इसका भी जल्दिये बन्दोवस्त करना पड़ेगा. साला मादड़ के....! भोसड़ी के बड़ा शोषलिस्ट बनता फिर रहा है. समाजवाद लाएगा."
"काहे नहीं आएगा समाजवाद चाचा. क्यों उन हरिजनों का कोई हक अधिकार नहीं है. पारस उसके साथ है तो क्या हुआ." आलोक आते हुए बोला- "वह चोट्टे लोगों के साथ नहीं है."
"तुम भी उसी का पक्ष ले रहे हो, समझ में आएगा."
"क्यों न लूँ पक्ष. सच्चाई का साथ देना ही चाहिए. जो नहीं देता है वही बेईमान है."
आठ बजे सबको लेकर पारस चला. कम से कम सत्तर अस्सी की संख्या में लोगों का हुजूम. आगे आगे सफेद कुरता पायजामा पर लाल रंग का निकर पहने पारस, उसके पीछे गिरधर, उसके पीछे लोगों का पूरा हुजूम. आज उसी गाँव जेवार में यह पहला मौका था जब झुगी झोपड़ियों में रहने वाले, समाज से बहिष्कृत और मलिन समझे जाने वाले, वर्षों से शोषित उत्पीड़ित लोग, अपने अधिकार के लिए प्रतिरोध का स्वर मुखर करने जा रहे हैं. अपने अस्तित्व की सुरक्षा की बात करने जा रहे हैं. आज का प्रभात इस बात का साक्षी बनने जा रहा है.
करीब दस बजे पैदल चल कर सदर अनुमंडल पहुँचा गया. एक बड़े कैम्पस के नीचे सारे लोग इकट्ठे हुए. पारस अंचल अनुमंडल के कार्यालय में पहुँचा. दो तीन कर्मचारियों को छोड़कर न वीडियो न अंचल पदाधिकारी. कार्यालय में घुसते हुए एक दो कर्मचारी से तू-तू मैं-मैं हुआ. तब जाकर पारस ने कैंपस में बैठे हुए लोगों की तरफ इशारा किया. वह कर्मचारी सकपकाया. पता करने पर यही मालुम हुआ कि वीडियो और अंचलाधिकारी दोनों दौरे पर गये हैं. ग्यारह-बारह बजे तक उनकी वापसी होगी.
कैंपस में लोग खुसर-फुसर कर रहे थे. कुछ को भूख सताने लगा था तो जो भी साथ लेकर गए थे, चने चबेने सत्तू प्याज, वे खा पी रहे थे. सबको बड़ा उम्मीद था कि आज उनकी व्यथा को सुना जाएगा. बारह बजे साहब आये. पारस उनके सामने उपस्थित होकर टेबल पर ज्ञापन सौंपा.
"कहाँ से आये हैं?" साहब पारस को नीचे से ऊपर तक लापरवाही से देखते हुए पूछा था.
"महुए से!" पारस इत्मीनान से दो टूक उतर दिया.
"क्या समस्या है?" अगला प्रश्न पूछा गया.
"हाकिम! हरिजन मुसहरों को जबरदस्ती इनके झोपड़ पट्टियों से बेदखल किया जा रहा है."
"अरे भाई ये लोग अतिक्रमण करेंगें, अवैध कब्जा करेंगे तो हटना तो पड़ेगा न."
"फिर सरकार को इनकी पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए. पहाड़, नदी, कछार-पठार कहीं तो इन्हें ठौर मिलना चाहिए. ये रहें तो अतिक्रमण है. बड़े लोग अपना कब्जा जमाए तो वैध है."
पारस के इस कटाक्ष पर साहव तिलमिला गया, लेकिन प्रत्यक्षतः बोला-"नहीं, नहीं; ये भी दखल कब्जा काहे करेंगे."
"धमकी तो यही मिल रहा है." पारस दृढ़ता से अपनी बात जारी रखा.
"ठीक है! हम उस जमीन का जाँच करवाते हैं.
"हाँ जमीन यदि सरकारी है तो उन भूमिहीनों को आवंटन कर परवाना बना दिया जाए."
शाम तक सभी वापस लौट गए थे. सभी खुश थे. सभी के चेहरे पर प्रसन्नता की चमक थी. क्या बच्चे, क्या बुढ्ढे, क्या जवान सभी की आँखों में एक उम्मीद की किरण कौंध रहा था. गये रात तक झोपड़ियों में मांस पकता रहा. बच्चे बर्तन पीटते रहे. स्त्रियाँ मंगल गाती रही. पारस घण्टों तक लोगों के बीच बैठा विभिन्न मुद्दों पर चर्चाएं करता रहा.
दूसरी सुवह आलोक मिलते ही पूछ बैठा- "अधिकारी क्या बोलता है?"
"पहले जाँच करेगा. फिर सबके नाम परवाना देने को बोला है.'
"गाँव के कुछ बिचौलिए को यह सब अखर रहा है."
"तो इससे क्या होगा. क्या उनकी अब फट रहा है."
"सूना है आज गाँव के सभी लोग मिलकर एक समिति का गठन करेंगे."
"इससे क्या होगा."
"ओंकारनाथ कहता है, इससे अगड़े पिछड़ों को एक मंच पर लाया जाएगा."
"इसमें कौन-कौन लोग शामिल होंगे." पारस को जिज्ञासा हुआ.
"भूमिहारों, यादवो, पंडितो, और बनियों की भागीदारी तो स्पष्ट है. गठन के बाद ही पता चलेगा." आलोक बोला.
"तुम जाओगे?" पारस पूछ लिया.
"हाँ, जाऊँगा तो अवश्य."
उसी शाम ठाकुरवाड़ी में मीटिंग की शुरुआत हुई. भूमिहार, यादव, कोइरी, बनिया, ब्राहाम्ण, सभी अगड़ी जातियों के लोग आए. किसी ने प्रतिरोध जताया- "चमारों और मांझियों में कोई नहीं आया."
"उ सब को इसमें शामिल नहीं करना है."
इस पर आलोक अपनी तीव्र प्रतिक्रिया देते हुए बोला- "फिर इस समिति के गठन का क्या मतलब जब उनलोगों का भागीदारी ही न हो. इससे तो निम्न जातियों में और असन्तोष की भावना जागृत होगी. वे और भी आक्रामक हो सकते हैं."
"तब क्या हम सभ्य और कुलीन लोग उन नीची जातियों को शामिल कर अपने पूर्वजों के मान सम्मान का गला घोंट दें."
"अच्छा! पूर्वजों की बड़ी चिंता हो रही है, कि उनके मान सम्मान को ठेस पहुँचेगा. लेकिन वेलोग जिन्हें नीची जाति कहकर हासिये से हटाकर फेंक दिया जा रहा है, क्या वे मान अम्मान के हकदार नहीं हैं."
"कोई कुछ भी कहे इन्हें किसी भी सूरत में शामिल नहीं किया जाएगा. अगर कोई शामिल करता है तो मैं किसी भी सूरत में कमिटी चलने नहीं दूँगा. जिसका बाप दादा सब दिन चाकरी किया, बेगार ढ़ोते दिन गुजरा, जिसके स्पर्श से देवता भी अशुद्ध हो जाता है, वह कमिटी में आकर क्या कर लेगा. कल समाजवाद की बात करेगा, समानता की बात करेगा, मार्क्सवाद की बात करेगा. लोगों को उकसाएगा. नहीं किसी को आने नहीं देंगे. " ओंकारनाथ ने अपना निर्णय सुना दिया. उसके चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे वह अपने निर्णय पर संकल्पित है.
"फिर किस उत्थान और विकास की बात कर रहे हो. क्या किसी ख़ास तबका या वर्ग विशेष का उत्थान ही सामाजिक उत्थान होगा. आज इकीसवीं सदी का युग है. नया और ऊर्जावान युग है. सबको समान रूप से जीने का हक है. कोई मनुष्य किसी दूसरे मनुष्य पर किसी प्रकार का दुर्भावना या गैर जिम्मेदाराना वर्ताव नहीं कर सकता." आलोक कड़ा विरोध करते हुए अपना बात जारी रखा.
तमाम स्वीकारोक्ति और प्रतिरोधों के बीच समिति का गठन सम्पन्न हुआ. भैरव सिंह को समिति का अध्यक्ष बनाया गया. ओंकारनाथ को समिति का सचिव. आलोक बुझे मन से अपने घर लौटा.
इधर पारस सोच रहा था-"अभी अफसर लोग इतनी आसानी से जमीन पर दखल कब्जा होने नहीं देगा. उसके लिए अभी लम्बी लड़ाई लड़नी होगी. उच्च वर्ग इतनी आसानी से अपनी हार मानने वाला नहीं है. वह जमीन पर अपना मालिकाना हक जमाने के लिए किसी भी हद तक जा सकता है. इसीलिए वह दलितों के मुहल्ले में जा जाकर उन्हें जगा रहा था. योजनाएँ बना रहा था और शोषण के विरुद्ध उसे खड़े होने के लिए प्रेरित कर रहा था. वह गिरधर को बतला रहा था--"तहसील का बाबू और अंचल के अफसर को यह बात पच नहीं रहा है. पारस को अनुभव हो रहा था कि करतार सिंह और बोधा सिंह कभी भी यह नहीं चाहेगा कि हरिजनों में कोई भी व्यक्ति उके सामने आँख में आँख मिलाकर बात करे. और जमीन पर अपना मालिकाना हक जमाए. विभागीय पदाधिकारियों को कभी भी गरीबों के पक्ष में खड़ा होना नहीं देखना चाहेगा.
बड़े बरगद के नीचे कुछ लोग बैठे आपस में बातचीत कर रहे थे. कुछ बच्चे वहीं पर ती-ती, ती-ती खेल रहे थे. कुछ घरों में धुँआ धुकुर हो रहा था. सुवह के करीब आठ बजे होंगे. चटक धुप के साथ मौसम बड़ा रमणीय लग रहा था. गिरधर कह रहा था- "हमें हमेशा तैयार रहना होगा. सरकार चोटा है. सभी अफसर मिले हुए हैं. करतार और बोधा सिंह अंचल को माल दे आया है."
"तुम्हे कैसे मालुम." किसी ने पूछा.
"पारस बतला रहा था."
"तब करतार तो हम सब को उखाड़कर दम लेगा."
"क्या उखाड़कर दम लेगा? हम क्या काश बनैल हैं. हम मरने के लिए तैयार हैं, पर जमीन नहीं छोड़ेंगे."
"हाँ- हाँ हम भी तैयार हैं भाई!"
गिरधर कह रहा था- "हमीं लोग टूट जाएँगे तो बेचारा पारस किसके लिए लड़ रहा है. वह सही कहता है रोने और गिड़गिड़ाने से हक नहीं मिलता. उसके लिए अपनी लड़ाई खुद लड़नी पड़ती है. हमें लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए.
"पर ये तो सोचो,ल वे लोग बरियार आदमी है. थाना पुलिस उसका है. उसके पास बन्दूक का बल है. हमारे पास क्या है." केश्वर मांझी तर्क दिया.
"हमारे पास साहस है. घर-घर में लाठी, खंती, गड़ासी, टांगा है कि नहीं. वही हमारा आयुद्ध बनेगा. तभी बुद्धराम वहाँ पहुँच गया.
"सूना है; करतार और बोधा सिंह थाने में एक सनहा लिखवाया है."
सभी चौंक गए. "सनहा क्यों?" कइयों के जुवान से प्रश्न फुट पड़ा.
"वो लिखाया है कि गये रात हरिजन टोला में नक्सली आता है. सबको इकठ्ठा करता है. और रात-रात भर मीटिंग करता है. हरिजनों को गाँव के ऊंची जातियों के खिलाफ भड़काता है."
"तुम्हे कैसे मालुम है, बुधन?"
"तरबना में गया था. वहाँ करतार सिंह तीन चार जनें के साथ ताड़ी पी रहा था. वहीं येसब बातें कर रहा था. हम छिपकर ये सब बातें सुन रहे थे."
"और किसी का नाम तो नहीं दिया है."
"नहीं दिया तो नहीं है लेकिन वह पारस, गिरधर और गोपाल का नाम ले रहा था."
गिरधर थोड़े देर के लिए अज्मजंस की स्थिति में रहा लेकिन प्रत्यक्षः वह बोला- "तो फिर हमलोग भी कमर कस लिए हैं. हममे से किसी को भी पुलिस छुआ तो सारे लोग थाने पर जाकर घेराव करेंगे."
शाम का धुंधलका छाने लगा था. सभी लोग अपने कामों से घर लौट रहे थे. पारस भी आ चुका था. गिरधर पूछ लिया- "क्या समाचार है गिरधर भाई."
"सब तो ठीक है. अनुमंडल गया था. बाभनो और यादवों ने भी अपना दावा पेश किया है.
"और सुना है किसी ने जाकर थाने में सनहा लिखवाया है."
"उससे क्या होगा." पारस बड़े इत्मीनान से बोला- " मैं जानता था वे लोग अपना कमीनापन से बाज नहीं आवेंगे. अब दो दिन और इन्तजार करना है. क्या होता है फिर हमें आर-पार की लड़ाई लड़ने के लिए तैयार रहना है."
दो दिन बाद सुवह से ही लोगों में उत्साह और डर का मिला जुला रूप घेरे आ रहा था. लोग अपना अपना मण्डली बनाकर खुसर- फुसर कर रहे थे. पारस दस बजे आने के लिए बोलकर चला गया था। उसने बताया था कि बीडीओ, अंचलाधिकारी और अन्य पदाधिकारियों को यहाँ तक लाने के लिए आलोक को भेज दिया हूँ. सभी लोग अपने घरेलू कार्यों को निपटाकर बड़े बरगद के नीचे जमा होने लगे थे. महिलाएँ भी चूल्हा चौका निपटाकर पेड़ के नीचे अलग मण्डली बनाकर बैठेने लगी थी. सभी टकटकी लगाकर उस मार्ग की ओर देख रहे थे, जिससे होकर पदाधिकारियों की जीप आने वाली थी. कुछ बच्चे जिज्ञासा वश अगले बड़े नाले तक पहुँच गये थे. उन बच्चो में एक अजीव प्रकार की उत्सुकता थी. उनमें एक उत्सव का माहौल उत्पात मचा रहा था. दूर पक्की सड़कों से जब भी कोई वाहन गुजरता, बच्चे तालियाँ पीटकर अपनी खुशी का इजहार करते. शोर सरावा करते कि वो आ गया, वो आ गया. धीरे-धीरे ग्यारह बज गया. लोग प्रतीक्षा रत थे. लोग तरह तरह के आशा निराशा के भंवर में डूब उतर रहे थे. लोगों में उत्सुकता और बेचैनी बढ़ रही थी.
प्रेम की स्थिति में प्रेमिकाएं मायूस हो जाती है. मुसाफिर बेचैनी के साथ समयसारणी को देखता है. लेकिन किसी नेता, मंत्री य अफसर का लेट लतीफी. उत्सुकता के साथ बेचैनी. अधीरता और शोर. उल्लास भी बढाता है. चर्चाएं तीखी नोक झोंक में बदल जाती है. कभी बहस भी तीखे तेवर का रूप ले लेता है. और भविष्य को चुनौती देने लगता है. उनलोगों के परेशानी का एक और कारण है कि अबतक पारस नहीं लौटा था. बुधन राम तीखे वचनों में बोल रहा था- "कहीं पारस हम सभी को चकमा देकर उन बड़े लोगों से मिलीभगत कर लिया तो".
इस पर गिरधर गरज उठा- "तुम्ही साला चोटा हो. स्वर्णो से हिल मिलकर थाली चाटते रहते हो. तुम्हारे हर बात में कोई न कोई शक सुबहा होता है."
बुधराम सकपका गया- "अरे भाई मैं तो बस ऐसे ही अनुमान लगा रहा हूँ।"
"तुम हमेशा अनुमान ही लगाते हो. हमें तो तुम्हारे नियत पर भी शक लगता है. उस दिन भी तुम अनुमंडल में नहीं गया था. ऐन जाते समय धोखा दे दिया था. तुम्ही जाओ बाभनो यादवों की जी हुजूरी करो. उसी के लौड़ा पर तेल लगाओ.'
बुद्धन पनपना कर वहाँ से चला गया.
कोई साढ़े बारह बजे एक जीप आई. सारे लोग दौड़ लगा दिए जीप की ओर. एक शोर सा उठने लगा. बच्चे, जवान, बूढ़े सभी जीप की ओर बढ़ने लगे. शायद बीडीओ आ रहा है. लेकिन यह क्या? जीप वहाँ हरिजन टोली में न आकर, पहले नाले से ही महुआ गाँव में मुड़ गया. लोगों का माथा ठनका. सभी कियाधरा सत्यानाश. बाभनो और यादवों ने मिलकर खेल खेल दिया. सभी लोग नाले से मायूस लौटने लगे. अभी तक न पारस लौटा था, न अतुल. अब क्या होगा. गिरधर सबसे ज्यादा परेशान दिख रहा था. एक तो बुधन का बक बक और उसकी अनुपस्थिति और उसे ही क्यों सभी लोगों को यह बात खल रहा था. घण्टो बाद किसी ने आकर सुचना दिया. बीडियो वहाँ गाँव में बाभनों को कागज दे रहा है. सभी लोग हैरान परेशान.
सभी लोगों को बुलाबा आया. करतार सिंह के हवेली पर महापंचायत है. सबको वहाँ जाना है. चलने में भी आनाकानी हुई, जाना चाहिए या नहीं. कुछ लोग चले अनिच्छा से, कुछ लोग बेमन से, तो कुछ लोग उत्सुकता से. गिरधर, गोपाल भी चल पड़ा. करतार सिंह के ढलान के सामने खाली मैदान था. बहुत सारे लोग कुर्सियों पर बैठे हुए थे. कुछ खाली कुर्सी पड़ी थी. गिरधर उस भीड़ में भी पारस को ढूंढ रहा था. गिरधर को निराशा हुआ. वह समझ गया कि यहाँ सब गड़बड़ घोटाला होगा. करतार सिंह, बोधा सिंह सभी मुछ पर ताव फेरते, दांते निपोर रहा था.
बीडीओ बोल रहा था- "भाइयों वह जमीन, जिसपर हरिजनों ने गैर कानूनी तरीके से अवैध कब्जा कर अपना मकान बना रहा है या बनाना चाहता है, दरअसल करतार सिंह और बोधा सिंह के पूर्वजों के नाम से है. हरिजन लोग उसे बिहार सरकार का जमीन बता कर कब्जा कर रहे हैं जो कि गैरकानूनी है. लोकतंत्र है और इस लोकतंत्र में सबको सम्मान रूप से जीने का अधिकार है. परन्तु सरकार किसी को यह रियायत नहीं देती कि लोग कहीं भी परती जमीन पर तम्बू गाड़कर अतिक्रमण करे. यह सरकारी आदेश जारी किया जाता है. और आदेश को देखते हुए इस हप्ते तक अतिक्रमण हटना चाहिए. नहीं तो सरकारी बुलडोजर आएगा और अवैध रूप से बनाया गया सभी मकान टूटेगा."
"फिर ऐसी स्थिति में इनके पुनर्वास की व्यवस्था कैसे और कहाँ होगा हाकिम. हर ब्लॉक अनुमंडल में अनाधिकृत और आम गर मजरुआ जमीन है. दूसरे दूसरे प्रांतो में ऐसे जमीन को चिन्हित कर भूमिहीनों के बीच आवंटित किया गया है. वैसे ही ईन सबको भूमि आवंटित कर दिया जाए."
"अच्छा है! अच्छा है!! जब ऊपर से आदेश आएगा जमीन आवंटित कर दिया जाएगा. लेकिन उससे पहले जो आदेश दिया गया है उसे शत प्रतिशत लागू किया जाए." वीडियो साहव घोषणा किए.
"मैं इस आदेश का विरोध करता हूँ. या तो पहले पुनर्वास की व्यवस्था किया जाए या बेदखल का आदेश वापस लिया जाए. तैश में गिरधर उबल पड़ा. उसके आँख में आग बरस रहा था. सभी वहाँ से लौट गए.
करीब तीन बजे पारस पहुँच कर घोषणा किया- "ये सभी लोकतंत्र के भेड़िये हैं. रंगे सियार हैं."
बाजी पलट गया. अब जिसे अपनी जमीन जायदाद बचाना है तो लड़कर हासिल करो. नहीं तो जंगल जाने की तैयारी कर दो. जिस व्यवस्था में गरीबों, वंचितों, निचले तबके के लोगों के सर पर छत का आश्रय नहीं मिल सकता वह व्यवस्था अपाहिज है."
"हम लड़ेंगे और घर भी बनाएंगे.
"तो कल से ही अपना अपना मकान बनाने में भिड़ जाओ."
उसी शाम सारे लोग फिर इक्कठा हुए. निर्णय हुआ कल से उसी परती जमीन पर भवन बनेगा. शाम का धुंधलका छाने लगा था. रात्रि अपनी व्यथा में लिपटी आ रही थी. अचानक बाइक पर सवार दो युवक आया. एक ने हरकत किया. गोली छुटी. और एक सनसनाता हुआ गोली आकर पारस के सीने में धँस गया. गिरधर दौड़ पड़ा और पूरे मोहल्ले में चीख पुकार मच गई.
समाप्त
रचना:- सेंट्रल जेल, गया
16/08/2022
®सुरेन्द्र प्रजापति
सुरेन्द्र प्रजापति
जन्म-8 अप्रैल 1985
आवासीय पता:-
घर-असनी, पोस्ट-बलिया
थाना-गुरारू, जिला-गया, बिहार
पिन न. 824205
ईमेल-surendraprar01@gmail.com
Mob. 7061821603
9006248245
पिता-स्व०.जगदीश
माता-स्व०.मैना देवी
शिक्षा-मैट्रिक
शौक-साहित्य की पुस्तकें पढ़ना, कहानी कविताएं लिखना,
ग्रामीण चहल-पहल, समालोचन, पुरवाई, पहलीबार एवं कुछ पत्र-पत्रिका में रचनाएं प्रकाशित

