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उम्मीद की किरणें: ग्रामीण चेतना की आवाज!
हिंदी साहित्य की परंपरा में कविता हमेशा से ही जीवन की सच्ची साक्षी रही है। वह न केवल व्यक्तिगत अनुभूतियों का दर्पण है, बल्कि सामाजिक परिवर्तनों की धुरी भी। जब हम समकालीन युवा कविता की बात करते हैं, तो सुरेन्द्र प्रजापति का पहला कविता-संग्रह उम्मीद की किरणें एक ऐसी धुरी के रूप में उभरता है, जो ग्रामीण भारत की दरकती नींवों को न केवल उजागर करता है, बल्कि उनमें नई जिजीविषा की किरणें भी भर देता है। वे अपनी कविताओं में उस ग्रामीण मिट्टी की सोंधी खुशबू बिखेरते हैं, जो हिंदी साहित्य की जनवादी धारा को ताजगी प्रदान करती है।
इस उपलब्ध संकलन की कविताएं, गाँव की पगडंडियों से संसद की सड़कों तक की यात्रा करता है। इसमें पीड़ा, संघर्ष, प्रेम और प्रकृति का संवाद इतना गहन है कि यह मात्र एक काव्य-रचना नहीं, बल्कि समकालीन हिंदी साहित्य की सामाजिक चेतना का दस्तावेज प्रतीत होता है।
प्रजापति की कविता की जड़ें ग्रामीण जीवन की कठोर सच्चाइयों में हैं, लेकिन उनकी शाखाएँ आशा की ओर फैली हुई हैं। संग्रह की भूमिका में स्वयं कवि कहते हैं: "मेरा यह पहला कविता संग्रह, उम्मीद की किरणें गाँव देहात के मलीन बस्तियों से होकर जीवन के हर पढ़ाव पर कुछ न कुछ संवाद करती और मनुष्य के पीड़ा, उदासी, हताशा, संवेदना को अंकित करती हुई, जीवन की पड़ताल भी करती है।" यह वचन संग्रह की आत्मा को प्रतिबिंबित करता है। हिंदी साहित्य में, जहाँ नागार्जुन जैसे कवि ग्रामीण विडंबना को व्यंग्य से काटते रहे, वहीं प्रजापति की दृष्टि अधिक संवेदनशील और आशावादी है। यह संग्रह 2020 के किसान-आंदोलनों की गूंज को भी समेटे हुए है, जहाँ कॉर्पोरेट लूट और सरकारी उपेक्षा, किसान की जिंदगी को निगल रही है। लेकिन कवि की कलम में निराशा का विष नहीं, बल्कि 'उम्मीद की किरण' का अमृत है। यह किरण न केवल व्यक्तिगत है, बल्कि सामूहिक चेतना का प्रतीक भी।
संग्रह की कविता को समझने के लिए हमें ग्रामीण भारत की वर्तमान त्रासदी को देखना होगा। आज का किसान, जो कभी धरती का लाल था, अब कर्ज के जाल में फँसकर आत्महत्या की ओर अग्रसर है। प्रजापति इस त्रासदी को तुम आत्महत्या करोगे जैसी कविता में इतनी मार्मिकता से चित्रित करते हैं कि पाठक का हृदय विदीर्ण हो जाता है। कविता की निम्न पंक्तियों को देखें:
यहाँ 'षड्यंत्र का सूरज' कॉर्पोरेट और सत्ता के गठजोड़ का प्रतीक है, जो किसान की जमीन को निगल रहा है। कवि आगे कहते हैं:
यह पंक्तियाँ मात्र वर्णन नहीं, एक पुकार हैं – एक विद्रोह की। लेकिन प्रजापति की विशेषता यही है कि वे निराशा पर रुकते नहीं। कविता का अंत आशा की चेतावनी से होता है:
यह भावी पीढ़ियों के प्रति उत्तरदायित्व की भावना हिंदी कविता की जनवादी परंपरा को स्मरण कराती है।
ग्रामीण पीड़ा का चित्रण संग्रह का केंद्रीय तत्व है। भूख कविता में माँ की करुणा का वर्णन इतना सच्चा है कि यह भूखमरी की अमानवीयता को उघाड़ देता है।
माँ का चूल्हा जलाकर खाली बर्तन चढ़ाना और आँसुओं की बूँदों से:
यह दृश्य डिकेंस के उपन्यासों-सा जीवंत है। लेकिन प्रजापति की कविता में यह व्यक्तिगत पीड़ा सामाजिक संरचना की आलोचना में बदल जाती है। वे पूछते हैं:
यह प्रश्न न केवल माँ का है, बल्कि पूरे ग्रामीण समाज का। संग्रह में ऐसी कई कविताएँ हैं जो भूख को मात्र शारीरिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक संकट के रूप में चित्रित करती हैं। चरवाहा में चरवाहे का जीवन –
लोक-गीतों की याद दिलाता है, लेकिन कवि इसमें वर्ग-संघर्ष की गहराई भर देते हैं। चरवाहा, जो:-
एक कुशल चिकित्सक से बेहतर अपना इलाज करता है। यहाँ कवि का प्रश्न गहन है:
यह पंक्ति ग्रामीण आत्मनिर्भरता की प्रशंसा है, जो आधुनिक चिकित्सा-व्यवस्था की विफलता पर प्रहार करती है।
प्रजापति की कविता में पीड़ा का द्वंद्व आशा से जुड़ा है। उम्मीद कविता इस द्वंद्व का सुंदर प्रतीक है:
यहाँ बीज किसान का प्रतीक है, जो सूखी धरती में भी फलने की आकांक्षा रखता है। कवि पतझड़, टेसू के फूल और प्रेमी युगल के माध्यम से आशा को बहुआयामी बनाते हैं। यह आशा अभिलाषा की फसल में और गहन हो जाती है:
प्रजापति की यह दृष्टि केदारनाथ अग्रवाल की मिट्टी का गीत से मेल खाती है, जहाँ मिट्टी श्रम की साक्षी है। लेकिन प्रजापति अधिक आधुनिक हैं – वे अभिलाषा को 'खाद' बनाते हैं, जो हताशा से उपजती है।
संग्रह की अन्य महत्वपूर्ण कविताओं में स्त्री-संवेदना है। हिंदी कविता में स्त्री को अक्सर पुरुष-दृष्टि से देखा गया है, लेकिन प्रजापति लड़की शीर्षक कविता में स्त्री को स्वतंत्र चेतना प्रदान करते हैं :-
यह पंक्तियाँ स्त्री की दमित इच्छाओं को उजागर करती हैं। श्रृंगार की बेड़ियाँ में कवि कहते हैं:
यह विद्रोह की पुकार है, जो महादेवी वर्मा की स्त्री-चेतना से प्रेरित लगती है, लेकिन अधिक सामाजिक। लड़की: प्रीति में नन्ही बालिका का ईश्वर से वरदान मांगना –
पारिवारिक बंधनों में स्त्री की भूमिका को संवेदनशीलता से चित्रित करता है। प्रजापति की स्त्री-कविता परंपरा-विरोधी है, जो एक स्त्री की अनुगूंज पीड़ा में चरम पर पहुँचती है:
यहाँ आटा गूंथना स्त्री-श्रम का प्रतीक है, जो वेदना से गूंथा जाता है।
समुद्र जीवन की गहराइयों का प्रतीक है, जहाँ कवि शरण लेने की कल्पना करता है। धरती में
धरती को अंतिम सहारा बनाना ग्रामीण मानव का प्रकृति से अटूट बंधन दर्शाता है। यह कविता त्रिलोचन की खेत की मिट्टी से जुड़ती है, लेकिन प्रजापति अधिक दार्शनिक हैं। गीत कविता में बारिश को प्रेम और स्मृति से जुड़ाव कितना यथार्थ है:-
निम्न पंक्तियाँ छायावादी संवेदना को जनवादी यथार्थ से मिश्रित करता है।
अब, संग्रह की प्रमुख कविताओं को देखना आवश्यक है। समय लिख रहा है... संग्रह की प्रारंभिक कविता है, जो समय को इतिहास-लेखक बनाती है।
कवि समय को असुरक्षा, कुपोषण और संसदीय राक्षस का साक्षी बनाते हैं:
ये पंक्तियाँ अमीर-गरीब की खाई को उजागर करती हैं, जो नागार्जुन की बादल को घिरते देखा है की याद दिलाती हैं। लेकिन प्रजापति का समय
'ईमानदार तर्कों को लिख रहा है',
जो आशा का संकेत है। कविता का अंत 'संगीन की तान' पर होता है, जो सशस्त्र विद्रोह की संभावना को ऊर्जा प्रदान करता है।
बेजान कंठ से भरूँगा स्वर विद्रोह की हुंकार है।
कवि स्वयं को 'रेगिस्तान में तपता ठूँठा बबूल' कहकर दलित-ग्रामीण चेतना व्यक्त करते हैं। यथा:-
यह पंक्तियाँ ओमप्रकाश वाल्मीकि की ठाकुर का कुआं से मेल खाती हैं, लेकिन प्रजापति अधिक काव्यात्मक हैं। कविता का अंत निर्माण की ओर है:
खिड़की के बाहर, ताकता हुआ बचपन बचपन की निश्छलता का सुंदर चित्रण है।
कवि बचपन को 'अनन्त आकाश का आँगन' से जोड़ते हैं, जहाँ
यह छायावादी बिंब है, लेकिन ग्रामीण संदर्भ में
कविता का अंत ब्रह्मांड के नूतन श्रृंगार पर होता है, जो बचपन को सृजन का प्रतीक बनाता है।
हौसले टूटते हैं प्रेम और हताशा का द्वंद्व है।
आँसू को समंदर से जोड़ना भावुकता की ऊँचाई है, जो "दिल से भी बहते हैं"। कविता का अंत:-
सुबह श्रृंखला की कविता में का आह्वान है। पहले भाग में
यह प्रभात का गान है। लेकिन कवि सामाजिक अंधकार को भी उजागर करते हैं:
चौथे भाग में
यह युग-जागरण की पुकार है।
फसल मुस्कुराई और मिट्टी का स्वाद किसान-उत्सव का चित्रण हैं।
यहाँ फसल मुस्कुराहट आशा का प्रतीक है। लेकिन विडंबना भी है:
वह नियति को कोसता है किसान की प्रकृति-संवेदना को दर्शाता है।
कवि किसान को गर्भवती माँ से तुलना करते हैं, जो सत्ता-षड्यंत्रों से लड़ता है।
प्रार्थना कविता आध्यात्मिक है। इन पंक्तियों को देखिए:-
ईश्वर को पारिवारिक बनाना ग्रामीण भक्ति है।
प्रेम-पत्र श्रृंखला रोमांटिक है।
प्रेम को प्रकृति से जोड़ना – सूर्य से गरमी, दूब से चंचलता – जयशंकर प्रसाद की याद दिलाता है।
जीवन का कर्ज सामाजिक ऋण का चित्रण है।
यह दार्शनिक है।
गरीबों के लिए अन्याय की चीख है:
आँखों का स्वप्न प्रतिक्रिया का अधिकार दर्शाता है: "फिर तुम मुझे जंजीरों में बाँधोगे, / हरियाली को सींचता बाग / बगैर, रक्तरंजित होते रह सका है / किसी युग, किसी काल में।"
प्रजापति की भाषा सहज है, आंचलिक शब्दों से समृद्ध। शैली मुक्त छंद प्रधान, लेकिन गीत-लय है। प्रतीक – मिट्टी, बीज, किरण जैसे शब्दों से सजा है
साहित्यिक संदर्भ में यह कवित संकलन की कविताएं, नागार्जुन की व्यंग्यपूर्णता, त्रिलोचन की हुंकार और अग्रवाल की प्रकृति-संवेदना का मिश्रण है।
और अंत में, उम्मीद की किरणें युवा कविता का उज्ज्वल अध्याय है। यह संग्रह हिंदी साहित्य को नई ऊर्जा देगी।
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